शुक्रवार, 26 जुलाई 2013

ऐसी वाणी बोलिए...

"ऐसी वाणी बोलिए मन का आपा खोय, औरन को शीतल करे आपहुं शीतल होय॥" शायद एक संत की यह सीख आज के दौर के राजनेता भूल गए हैं। दिग्विजय सिंह,बेनीप्रसाद वर्मा,नरेंद्र मोदी,राज ठाकरे,मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव, मायावती, ममता बनर्जी ये वे नाम है जो अपनी फिसलती जिव्हा के कारण आए दिन सुर्खियों व विवादों में रहते हैं। क्या हमारे शब्दकोश का दारिद्रय इतना बढ़ गया है कि हमें अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति के लिए अच्छे;सार्थक व मर्यादित शब्दों का मिलना असंभव प्रतीत होने लगा है जिसके कारण हमें निम्न स्तरीय;ओछे व अमर्यादित शब्दों की शरण लेनी पड़ रही है या फिर इन राजनेताओं की बुद्धि के स्तर में तेजी से पतन हुआ है क्योंकि यह कह देना कि मेरे बयान का गलत अर्थ निकाला गया है या उसे तोड़-मरोड़ के पेश किया गया है, महज़ एक वंचना मात्र है। शब्दों का जादूगर तो वह व्यक्ति होता है कि विरोधी चाहकर भी उसकी बात के अर्थ को अनर्थ ना कर सकें। हमने ऐसे शब्दों के जादूगरों को अपने ही देश में देखा है उन्हीं में से एक नाम है पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटलबिहारी वाजपेयी। हमारे मनीषियों ने शब्द को ब्रह्म कहा है। शालीनता से; मर्यादित व कर्णप्रिय बोलना एक प्रकार से ब्रह्म की उपासना करना है वहीं असभ्यतापूर्ण;अमर्यादित व दूसरे को क्षोभ पहुंचाने वाला संभाषण उस ब्रह्म का निरादर है। शब्दों की एक खास ढंग से की गई जमावट ही तो मंत्र या वरदान कहलाती है और जब ये नहीं होती तो श्राप या गाली-गलौज बन जाती है। जो व्यक्ति इस सूक्ष्म विभेद को नहीं समझता उसे बोलने का कोई अधिकार नहीं है, कम से कम वक्ता होने का तो बिल्कुल भी नहीं। आज के दौर के ये सारे राजनेता भली भांति जानते हैं कि जो मीडिया इनकी छींक तक को राष्ट्रीय फलक पर लाकर सुर्खियां बटोर लेता है वो इनके बेतुके बयानों को क्या यूं ही नज़रअंदाज़ कर देगा; नहीं कदापि नहीं, फिर भी ये अपने निम्न स्तरीय व संकीर्ण मानसिकता वाले बयानों से खबरों में बने रहना चाहते हैं क्योंकि इन्हें सुना जाता है। जिस दिन इस देश की जनता अमर्यादित बयानबाजी करने वाले नेताओं को सुनना बंद कर देगी और मीडिया उन्हें उछालना रोक देगा उसी दिन से ये अमर्यादित वक्ता अपनी वाणी पर अंकुश लगाना प्रारंभ कर देंगें। आखिर किसी बेतुके बयान को बार-बार प्रसारित करने का क्या औचित्य? क्यों उसे इतना महत्व दिया जाता है। यदि एक बार किसी नेता ने मर्यादा लांघी तो उसका संपूर्ण बहिष्कार क्यों नहीं किया जाता। क्यों उसकी एक "बाइट" के लिए पुनः मीडया लालायित रहता है? सच तो यह है कि मीडिया भी ऐसे मसालेदार बयानों की खोज में रहता है जिससे खबर ज़्यादा उत्तेजक बने परन्तु इन सबके कारण जो सामाजिक व सांस्क्रतिक नुकसान होता है उसकी भरपाई कौन करेगा। इस प्रकार गलत वस्तुओं को प्रवाह में डालने से अंततोगत्वा राष्ट्र व समाज की हानि ही होती है। होना तो यह चाहिए कि श्रेष्ठ को प्रवाहमान किया जाए और निक्रष्ट को रोका जाय जिससे देश की राजनीति में एक गलत परम्परा की शुरूआत होने से बचा जा सके।

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