शनिवार, 13 जुलाई 2013

अर्ज़ किया है.....

अब नहीं अटकता दिल दुपट्टे में
उम्र का अपना तकाज़ा होता है

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कहां तो मुश्किल था लम्हा तेरे बगैर
कहां गुज़ार दी देख ज़िंदगी हमने

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ज़ायका बिगाड़ गया सब्र का फल
हमने तो सुना था मीठा होता है

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अपने बदरंग लिबासों की फिक्र कौन करे
बे-पर्दा रूह का जब एहतराम हो निगाहों में

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वादों का टूटना तो सुना था अक्सर शेख
आजकल कोशिशें भी कामयाब नहीं होतीं

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ए पारस सा मिज़ाज़ रखने वाले
मैं संग सही छूकर मुझे नवाज़ दे

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 "इक हसीं हमसफ़र की तौफ़ीक दे दे
 मैंने कब तुझसे हरम मांगा है"

हरम-ऐशगाह
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"मैं आज तेरा हमसफ़र ना सही
 कभी हम दो कदम साथ चले थे"

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"गर तू खुद को दानां समझता है
 पढ़ मेरी आंखों में मेरे दिल को"

दाना-बुद्धिमान
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"तुम मेरे नक्शे-पा मिटाते हुए चलना
 कोई और ना मेरे बाद कांटों से गुज़रे"

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"अदब-औ-मुहब्बत से मिलो सबसे
 जाने कौन सी मुलाकात आखिरी हो"

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"ये कैसा अहद अब आ गया है शेख
 मुहब्बत रस्म अदायगी सी लगती है"


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"हाथ ताउम्र खाशाक से भरे रहे
 गौहर भी मिले तो यकीं नहीं होता"

खाशाक=कूड़ा-करकट 
गौहर=मोती

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"मुफ़लिसों को थी चांदनी की जुस्तजू
 रसूख़दारों ने महे-कामिल कैद कर लिया"

महे-कामिल=पूर्ण चंद्र
जुस्तजू-इच्छा;अभिलाषा

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"हर कोई निगाहों से गिरा देता है
 अदने से अश्क की बिसात ही क्या"


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"खास होने की जद्दोजहद में लगे हैं सभी
 इतना आसां भी नहीं है आम होना"

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"कद का बातों पे हुआ कुछ ऐसा असर
 हमारी सब फिज़ूल, उनकी उसूल हुईं।"

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"जाने इस नस्ल का अब क्या होगा
 सियासत रिश्तों में जज़्ब हुई जाती है"

जज़्ब-समाना
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ये कैसा अहद अब आ गया है शेख
मुहब्बत रस्म अदायगी सी लगती है

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जोड़-घटाना अशआरों में कीजिए
इंसा तरमीम को राज़ी नहीं होते

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हमने ज़रा कहा तो तिलमिला गए
लोगों को सच की आदत जो नहीं

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खास होने की जद्दोजहद में लगे हैं सभी
इतना आसां भी नहीं है आम होना

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"कद का बातों पे हुआ कुछ ऐसा असर
 हमारी सब फिज़ूल, उनकी उसूल हुईं।"

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आसान मश्गला ना समझो अशआरों को गढ़ लेना
सौ बार तराशे जाते हैं ये दिल में उतरने से पहले


मश्गला-कार्य
अशआर-काव्य पंक्तियां

-हेमन्त रिछारिया
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