गुरुवार, 11 जुलाई 2013

जनतंत्र यात्रा

भ्रष्टाचार के विरूद्ध लड़ाई लड़ रहे समाजसेवी अन्ना हजारे की जनतंत्र यात्रा मध्यप्रदेश में प्रवेश कर चुकी है। उनकी आमसभाओं में भीड़ दिन-ब-दिन कम होती जा रही है। शायद अब आम-आदमी को जन-लोकपाल का सही मतलब समझ आने लगा है। भ्रष्टाचार का अर्थ सिर्फ आर्थिक अनियमितताएं या रिश्वत का लेन-देन नहीं होता। भ्रष्टाचार के मायने व्यापक है। भ्रष्टाचार की सटीक परिभाषा यदि करूं तो वह है भ्रष्ट-आचरण। अपने कर्तव्य स्थल पर समय पर उपस्थित ना होना, लाइन तोड़कर बिल जमा करना या मंदिर में दर्शन करना, शहर और नदियों को प्रदूषित करना, आयकर बचाने के लिए आय छिपाना, मिलावट करना, मिथ्या संभाषण करना, अपने देश के गौरव और उसकी संस्क्रति को भूलना, सरकारी संपत्तियों का दुरूपयोग करना, भू-संपदाओं का दोहन करना,आदि-आदि सब भ्रष्टाचार का ही रूप है। जब हम भ्रष्टाचार के इन रूपों के बारे में विचार करते हैं तो पाते हैं कि हम सब कहीं ना कहीं इसमें शामिल हैं। हमारे देश में जितने कानून हैं यदि सब के सब कड़ाई से पालन कराए जाएं तो आम आदमी का जीना दूभर हो जाएगा। बानगी के लिए मकान बनाने के लिए अनापत्ति प्रमाण-पत्र लेते समय जो नियमों की सूची दी जाती है उसमें एक नियम यह भी है कि भूमिस्वामी अपने मकान के चारों ओर ५-५ फीट की जगह नाली,पेड़ इत्यादि के लिए छोड़ेगा। अब ज़रा अपने आसपास नज़र दौड़ाईए और अपने स्वयं के भवन को देखिए कि कहां तक इस नियम का पालन किया गया है। यदि जन-लोकपाल आ जाता है तो भले ही कोई आपसे रिश्वत की मांग ना करे परन्तु नियमों के पालन करने में आम आदमी का पसीना छूट जाएगा। मेरे देखे भ्रष्टाचार से मुक्ति का एक सूत्र है: सुव्यवस्था+नैतिक उत्थान=भ्रष्टाचार मुक्त सामाजिक व्यवस्था। भ्रष्टाचार वह ताली है जो एक हाथ से नहीं बजती। यदि आज भ्रष्टाचार को शिष्टाचार कहा जाने लगा है तो इसे निभाने वाले कौन हैं, हम ही हैं। क्योंकि हमें आज सब कुछ "इंस्टेंट";त्वरित चाहिए। हमारे पास समय व धैर्य कहां है? हम चाहते हैं भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था हमें मिले पर इसके लिए कुर्बानी कोई अन्ना, कोई केजरीवाल दे, यह कहां तक उचित है। हमें भी अपने स्तर पर कोई ना कोई शुरूआत तो करनी होगी सिर्फ अन्ना की सभाओं में जाकर "अन्ना तुम संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं" कह देने मात्र से तो आप अन्ना के साथ नहीं हो जाते। अन्ना के साथ होने का मतलब है उनके सिद्धांतो के अनुरूप जीवनचर्या का अनुपालन, जो आसान बात नहीं है। जब इस मुद्दे पर बात आती है तो यही तथाकथित आम आदमी यह कहकर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं कि "हम तो पेट की लड़ाई लड़ रहे हैं"। दरअसल हम अपने स्तर पर कोई शुरूआत करना ही नहीं चाहते। सब कुछ पका-पकाया चाहते हैं। श्रीमद्भागवत में उल्लेख है कि जो आवश्यकता से अधिक धन संचय करता है वह चोर है, कितना सीधा सूत्र है। अब ज़रा पूरी निर्दोषता से अपने आप से पूछिए क्या मैंने आवश्यकता से अधिक धन एकत्रित किया है? मेरा दावा है ९० फीसदी आम आदमियों का जवाब "हां" में आएगा। भ्रष्टाचार मुक्त भारत, लोकशाही, ईमानदारी, ये सब कहने-सुनने जितने अच्छे लगते हैं जीने में उतनी कठिन परीक्षा लेते हैं। इसका यह आशय कतई नहीं कि ये कोशिश नहीं होनी चाहिए;निश्चित होनी चाहिए मगर अन्ना की तरह। अन्ना ने पहले खुद को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया फिर इन कुव्यवस्थाओं के विरूद्ध शंखनाद किया। हमारा आज का आम आदमी शंखनाद पहले कर रहा है और आचरण में इससे कोसों दूर हैं। मेरे देखे आम आदमी होना कोई सरल बात नहीं है यह बेहद असाधारण चीज़ है।
"It is so simple conman man change whole corrupt system but is so difficult to be a conman man."
-हेमन्त रिछारिया

पुनश्च: कल रात एक न्यूज़ चैनल ने एक खबर प्रसारित की जिसमें यूपी के एक पूर्व विधायक श्री भगवती प्रसादजी का अत्यंत निर्धनता के चलते इलाज ना मिल पाने के कारण निधन हो गया। वे दो बार विधायक रह चुके थे। उन्होंने पूरी ईमानदारी से अपना कार्यकाल व जीवन जिया। बाद में वे एक चाय की दुकान चलाकर अपना जीवकोपार्जन करते रहे। हाल ही में उन्होंने सरकारी अस्पताल में दम तोड़ दिया कारण था इलाज के लिए पर्याप्त पैसों का अभाव। उन्हें मेरी भावभीनी श्रद्धांजली।

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