बुधवार, 10 जुलाई 2013

"काम(सेक्स) ज़हरीला होकर ज़िंदा है"

प्रसिद्ध विचारक फ्रायड ने कहा था कि "हिंदुस्तान ने काम को ज़हर देकर मारने कोशिश की है मगर काम ज़हरीला होकर ज़िंदा है।" फ्रायड ने ठीक ही कहा था । आज जब-जब भी कोई कामुक विकृति से जुड़ी ख़बर आती है तो मुझे ओशो याद आ जाते है। वे अकेले ऐसे संबुद्ध व्यक्ति थे जिन्होंने इस ज्वलंत मुद्दे पर कुछ कहने का साहस जुटाया था। मगर अफ़सोस इस देश व दुनिया के अधिकतर लोगों ने उन्हें नहीं समझा जिसका दुष्परिणाम आज हम सब भुगत रहे हैं। ओशो हमेशा कहते थे कि काम का दमन नहीं वरन अतिक्रमण करो, जागरण करो। उनके अनुसार होशपूर्वक किया काम ही काम से मुक्ति है। आज हमारे चारों दमन सिखाया जा रहा है जिसके फलस्वरूप उर्जा विकृत होकर अत्यंत घृणित रूप से बाहर आ रही है। केवल मनुष्य ही है जो २४ घंटे कामुक रह सकता है क्योंकि पशु-पक्षियों की तो ऋतु होती है जिसमें वे कामुक होते हैं। उर्जा तो एक ही है उसे "काम" कहें या "राम"। राम से यहां तात्पर्य उर्जा के उर्द्धगमन से है। उर्जा का नियम है यदि वो ऊपर नहीं जाएगी तो नीचे जान शुरू कर देगी जो कि सहज मार्ग है। चढ़ने में हमेशा कठिनाई होती है गिरना हमेशा से सरल रहा है। जब तक हम इस उर्जा को रूपांतरित कर उर्द्धगमन में संलग्न नहीं कर देते तब तक इस प्रकार की यौन दुर्बलताओं से निजात नहीं पा सकते। दमन तो सिर्फ और सिर्फ उर्जा को विकृत ही करता है इसलिए दमन नहीं वरन जागरण।

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