रविवार, 9 जून 2013

परमवीरचक्र विजेता श्री योगेन्द्र यादव से भेंट-

परमवीरचक्र विजेता श्री योगेन्द्र यादव
कल शाम मुझे एक मित्र के माध्यम से पता चला कि रात्रि १०:३० बजे श्रीधाम एक्सप्रेस से देश का गौरव परमवीरचक्र विजेता श्री योगेन्द्र यादव गुजरने वाले हैं। वे यहां कुछ देर रुकेंगे। मैंने तुरन्त अपने कुछ खास मित्रों को सूचित किया और हम सभी फूल-मालाएं लेकर उनके दर्शन हेतु रेल्वे स्टेशन पहुंच गए। मिलट्री मेन की संगत का असर देखिए कि ट्रेन ने भी अपने पूर्ण अनुशासन के साथ ठीक समय पर स्टेशन पर आमद दी। जैसा कि बताया गया था कि श्री यादव बी.१ के वातानुकूलित कोच में यात्रा कर रहे हैं। जैसे ही ट्रेन का बिगुल सुनाई दिया तनमन में एक अजीब सा स्पंदन होने लगा। ट्रेन के आते ही मैं अपने मित्रों सहित बी.१ कोच की ओर दौड़ा। गाड़ी के रुकते ही कोच का दरवाज़ा खुला और उसमें से एक मझौले कद और गठीले बदन वाला युवक सिर पर टोपी लगाए ठीक मेरे सामने आकर खड़ा हो गया। मैंने देखते ही पहचान लिया कि यही श्री योगेन्द्र यादव हैं परन्तु रोमांच के कारण मैं हाथ में माला लिए किंतर्तव्यविमूढ़ सा स्तब्ध खड़ा रहा। परमवीरचक्र विजेता मेरे सामने थे और मैं जड़वत खड़ा था। मुझे समझ ही नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूं? इतने में मुझे किसी मित्र का धक्का लगा जिससे मैं अपने आप में वापस आया और तत्काल मैंने माला उनके गले में पहना दी। उन्होंने मुस्कुराकर मेरा अभिवादन स्वीकार किया। मैं उनके चरण छूने को झुका तो उन्होंने मेरे हाथ पकड़ लिए। मैंने कहा-सर,आज जीवन धन्य हो गया। इस पर वो बोले-"वो तो मेरा फ़र्ज़ था।" इसके बाद सभी मित्रों ने उन्हें फूलमाला पहनाकर उनका अभिनंदन किया। इतने में ट्रेन की बिगुल एक बार फिर बज उठा और श्री यादव ने हाथ हिलाकर एवं "भारतमाता की जय" के साथ हम सभी को अलविदा कहा। एक अभूतपूर्व गौरव का क्षण हमारी झोली में सौगात के रूप में डाल कर श्री यादव ने हमसे विदा ली। इस अवसर पर मेरे साथ कवि एवं साहित्यकार श्री संतोष व्यास, सर्वब्राह्मण समाज की युवा शाखाध्यक्ष प्रियंक दुबे, शशांक दुबे, रवि दुबे व लल्ला सहित कई मित्र उपस्थित थे।
श्री योगेन्द्र यादव जी के अदम्य साहस का पूर्ण वर्णन यहां देखें-
http://www.bharat-rakshak.com/HEROISM/Yadav.html 

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