शनिवार, 15 जून 2013

शरद जोशी प्रसंग

स्व. श्री शरद जोशी
म.प्र.साहित्य अकादमी द्वारा आयोजित प्रख्यात व्यंग्यकार शरद जोशी पर केन्द्रित कार्यक्रम "शरद प्रसंग" में जाने का अवसर प्राप्त हुआ। वहां प्रदेश के मूर्धन्य साहित्यकारों ने शरद जोशी एवं उनके व्यंग्य लेखन पर अपने विचार प्रस्तुत किए। इसी क्रम में साहित्यकार श्री अशोक जमनानी जी ने अपने विचार रखते हुए कहा कि जब मुझे शरद जोशी की बात करनी होती है तो मैं हरिशंकर परसाई से शुरू करता हूं। क्योंकि उनके व्यंग्य का केन्द्र राजनीति थी और जब उनसे इस बाबत पूछा जाता कि आप राजनीति पर ही क्यों लिखते करते हैं तो वे कहते कि "मेरी चाय की प्याली में कितनी शकर होगी ये जब राजनीति ही तय करती हो तो मैं राजनीति पर क्यों ना लिखूं।" लेकिन शरद जोशी से जब पूछा जाता कि आप लोक पर क्यूं लिखते हैं तो उनका जवाब होता कि "मैं एक-एक पत्ते को साफ करना चाहता हूं जिससे जड़ें स्वस्थ हो सकें।" विद्वान साहित्यकार ने कहा कि इसीलिए शरद जोशी कहीं आगे हैं। मेरे देखे हरिशंकर परसाई व शरद जोशी दोनों ही करीब-करीब जड़ की बात कर रहे हैं, या यूं कहें कि हरिशंकर परसाई तने की और शरद जोशी विशुद्ध रूप जड़ की बात कर रहें हैं क्योंकि जिस राजनीति को आज नीति-नियंता माना जा रहा है उस राजनीति की जन्मदात्री संस्था और उद्ग्म का मूल स्रोत तो "लोक" ही है। लोकतंत्र से राजनीतिक सरकारें बनती हैं, जो हमारे चाय की प्याली में कितनी शकर होगी, हमें साल में कितने सिलेंडर मिलेंगे, हमारी सब्जी में टमाटर होंगे या नहीं;आलू-प्याज होंगे या नहीं ये सब तय करती है। आज ऐसे कितने व्यक्ति हैं जो राष्ट्रहित को ध्यान रखकर अपना मत देते हैं? आज के जनप्रतिनिधियों का चुनाव नितांत व्यक्तिगत हितों के आधार पर होता है। तो मेरे देखे सब समस्याओं की जड़ व समाधान "लोक" ही है इसलिए शरद जोशी ने मूल रूप से जड़ पर ही प्रहार किया है इसलिए वे व्यंग्यकारों में अग्रणी हैं।

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