रविवार, 26 मई 2013

अर्ज़ किया है-

 "इक हसीं हमसफ़र की तौफ़ीक दे दे
 मैंने कब तुझसे हरम मांगा है"

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"मैं आज तेरा हमसफ़र ना सही
 कभी हम दो कदम साथ चले थे"

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"गर तू खुद को दानां समझता है
 पढ़ मेरी आंखों में मेरे दिल को"

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"तुम मेरे नक्शे-पा मिटाते हुए चलना
 कोई और ना मेरे बाद कांटों से गुज़रे"

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"अदब-औ-मुहब्बत से मिलो सबसे
 जाने कौन सी मुलाकात आखिरी हो"

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"ये कैसा अहद अब आ गया है शेख
 मुहब्बत रस्म अदायगी सी लगती है"


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"हाथ ताउम्र खाशाक से भरे रहे
 गौहर भी मिले तो यकीं नहीं होता"

खाशाक=कूड़ा-करकट 
गौहर=मोती

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"मुफ़लिसों को थी चांदनी की जुस्तजू
 रसूख़दारों ने महे-कामिल कैद कर लिया"

महे-कामिल=पूर्ण चंद्र

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"हर कोई निगाहों से गिरा देता है
 अदने से अश्क की बिसात ही क्या"

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"जोड़-घटाना अशआरों में कीजिए
 इंसा तरमीम को राज़ी नहीं होते"

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"हमने ज़रा कहा तो तिलमिला गए
 लोगों को सच की आदत जो नहीं"

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"खास होने की जद्दोजहद में लगे हैं सभी
 इतना आसां भी नहीं है आम होना"

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"कद का बातों पे हुआ कुछ ऐसा असर
 हमारी सब फिज़ूल, उनकी उसूल हुईं।"

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"जाने इस मुल्क का अब क्या होगा
 सियासत रिश्तों में जज़्ब हुई जाती है"

-हेमन्त रिछारिया
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