गुरुवार, 2 मई 2013

एक था सरबजीत...

आखिरकार सरबजीत सिंह रिहा हो गया; पाकिस्तान की कैद से नहीं बल्कि ज़िंदगी की कैद से। जो कुछ भी हुआ वो सरबजीत का नसीब था; पाकिस्तान की बर्बरता थी; हमारी सरकार का लचर रवैया था या फिर ये तीनों मगर एक हकीकत को हमें दिल में टीस और आंखों में आंसू लिए स्वीकार करना ही होगा कि सरबजीत अब हमारे बीच नहीं रहा। इसके लिए जितनी दोषी पाकिस्तानी सरकार है उतनी ही ज़िम्मेवार भारत सरकार भी है। आज हमारी विदेश नीति इतनी लचर और तुष्टिकरण से भरी हुई है कि इसके लिए वो किसी भी हद समझौता करने को तैयार है चाहे वो कैप्टन सौरभ कालिया हो, चाहे हमारे सेना के जवान जिनका सर काट दिया जाता है और हमारी सरकार खामोश बैठी रहती है इतना नहीं पाकिस्तानी हुक्मरानों का स्वागत सत्कार करने में भी कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ती। सत्तारूढ़ दल के नेता अपनी इसी तुष्टिकरण नीति के चलते कभी ओसामा को ओसामा जी कहते हैं तो कभी दुर्दांत आतंकी हाफिज़ सईद को मि. हाफ़िज़ सईद कहते नज़र आते हैं। यदि भारत सरकार का ऐसा ही लचर रवैया रहा तो वह दिन दूर नहीं जब हम एक गंभीर संकट के मुहाने पर होंगे। आज चीन हमारी सीमा १९ किमी अंदर तक घुस आता है और हमारे प्रधानमंत्री कहते हैं कि मामले को अधिक तूल ना दिया जाए। धिक्कार है ऐसे प्रधानमंत्री और सरकार पर जो अपनी तुष्टिकरण की नीति के चलते अपने देश की सीमा और देशवासियों की जान तक को दांव पर लगा देते हैं। यदि समय रहते ऐसी दुर्बल सरकार को सत्ता से उखाड़ नहीं फेंका गया तो वह दिन दूर नहीं जब भारत एक बार फिर से गुलामी की
जंजीरों के करीब होगा।

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