सोमवार, 8 अप्रैल 2013

शेर अर्ज़ किया है...

" इक हसीं हमसफ़र की तौफ़ीक दे दे
  मैंने कब तुझसे हरम मांगा है"

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"मैं आज तेरा हमसफ़र ना सही
 कभी हम दो कदम साथ चले थे"

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"तुम मेरे नक्शे-पा मिटाते हुए चलना
 कोई और ना मेरे बाद कांटों से गुज़रे"

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" अदब-औ-मुहब्बत से मिलो सबसे
  जाने कौन सी मुलाकात आखिरी हो"
 
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"गर तू खुद को दानां समझता है
 पढ़ मेरी आंखों में मेरे दिल को "

-हेमन्त रिछारिया

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