बुधवार, 3 अप्रैल 2013

लाल किला या लाल कोट

मित्रों हाल ही में पी.एन.ओक की पुस्तक "भारतीय इतिहास की भयंकर भूलें" पढ़ी। इसे पढ़कर मेरे मस्तिष्क के तंतु झनझना उठे और मन अत्यंत पीड़ा से भर गया। इस पुस्तक को पढ़ने के उपरांत जो तथ्य जानकारी में आए उनसे यह स्पष्ट होता है कि किस प्रकार हमारे अपने स्मारकों,भवनों,महलों व मन्दिरों को विदेशी मुस्लिम आक्रांताओं ने अपनी आरामगाह व इबादत स्थल बनाकर उन्हें अपने नाम से दुष्प्रचारित किया है। इतना नहीं हमारे पूरे इतिहास के वास्तविक तथ्यों से छेड़छाड़ कर उसे विक्रत कर दिया। आज़ाद भारत के प्रथम शासक इस बात से अनजान बने अपनी आंखों पर पट्टी बांधे रहे। जिनका दायित्व सबसे पहले भारतीय इतिहास को पुनर्जीवित करने का था। वे इस प्रकार के दुष्प्रचार के प्रति अत्यंत उदासीन रहे। इसका असर यह हुआ कि आज हम उन्हीं दुष्प्रचारों को प्रामाणिक तथ्य मानकर स्वीकार किए हुए हैं। आज की पीढ़ी ऐसे ही दुष्प्रचारों को वास्तविक व प्रामाणिक तथ्य मानकर समादर देती जा रही है और शायद आने वाली पीढ़ियां भी देती रहेंगी। आज हम अपने उन स्मारकों के वास्तविक रूप व निर्माताओं से अनजान हैं जो कभी हमारे देश का गौरव हुआ करते थे। ऐसे कुछ स्मारकों की चर्चा मैं यहां करना चाहता हूं व उनके वास्तविक रूप से आपका परिचय करवाना चाहता हूं। ये सभी तथ्य उसी पुस्तक से लिए गए हैं जिसका उल्लेख मैंने पूर्व में किया है। यहां मेरा उद्देश्य आप सभी मित्रों को उस पुस्तक को पढ़ने के लिए प्रेरित करना है, जिसका नाम है-"भारतीय इतिहास की भयंकर भूलें"। तो आईए जानते है उन स्मारकों के बारे में-
 स्मारक--वास्तविक रूप व नाम-
१. ताजमहल--राजपूताना महल जिसमें शिव मन्दिर था-तेजोमहालय
२. लाल किला--राजा प्रथ्वीराज का महल-लाल कोट
३. कुतुबमीनार--नक्षत्र विद्याध्ययन के लिए बनाय गया वेध-स्तंभ जिसका प्रयोग विक्रमादित्य के 
                       --विश्वविख्यात  ज्योतिषी "मिहिर" किया करते थे।
४. डल झील--दल झील (पत्ता या पल्लवगुच्छ)
५. सोनमर्ग--स्वर्ण मार्ग
६. गुलमर्ग--गौरिमार्ग
७. वेरिनाग--वारिनाग (संस्क्रत का शब्द जो "जल-सर्प" का द्योतक है)
८. शेख सल्ला दरगाह--पुण्येश्वर व नारायणेश्वर मन्दिर पूना में स्थित
ये तो बस बानगी है ऐसे कई उदाहरणों के लिए पढ़िए "भारतीय इतिहास की भयंकर भूलें" लेखक पी.एन.ओक।

कोई टिप्पणी नहीं: