गुरुवार, 25 अप्रैल 2013

याद तुम्हारी...

याद तुम्हारी जैसे कोई
कंचन कलश भरे,
जैसे कोई किरण अकेली
पर्वत पार करे।
लौट रही गायों के संग-संग
याद तुम्हारी आती,
और धूल के संग-संग
मेरे माथे को छू जाती,
दर्पण में अपनी ही छाया-सी
रह-रह उभरे
जैसे कोई हंस अकेला
आंगन में उतरे,
जब इकला कपोत का जोड़ा
कंगनी पर आ जाए,
दूर चिनारों के वन से
कोई वंशी स्वर आए,
सो जाता सूखी टहनी पर
अपने अधर धरे,
लगता जैसे रीते घट से
कोई प्यास हरे।

-कवि माहेश्वर तिवारी

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