गुरुवार, 25 अप्रैल 2013

याद तुम्हारी...

याद तुम्हारी जैसे कोई
कंचन कलश भरे,
जैसे कोई किरण अकेली
पर्वत पार करे।
लौट रही गायों के संग-संग
याद तुम्हारी आती,
और धूल के संग-संग
मेरे माथे को छू जाती,
दर्पण में अपनी ही छाया-सी
रह-रह उभरे
जैसे कोई हंस अकेला
आंगन में उतरे,
जब इकला कपोत का जोड़ा
कंगनी पर आ जाए,
दूर चिनारों के वन से
कोई वंशी स्वर आए,
सो जाता सूखी टहनी पर
अपने अधर धरे,
लगता जैसे रीते घट से
कोई प्यास हरे।

-कवि माहेश्वर तिवारी

बुधवार, 17 अप्रैल 2013

कौनो ठगवा नगरिया लूटल हो....

यदि आपसे पूछा जाए कि क्या आप जानते हैं कि हाल ही में रूपए के जिस चिन्ह को राष्ट्रीय मान्यता प्रदान की गई, उसके जनक कौन है? तो आप कहेंगे- डी उदया कुमार! यूं तो बिल्कुल ठीक कहा आपने लेकिन क्या आप जानते हैं कि डी उदया कुमार कौन हैं और ये रूपए के चिन्ह का चयन करने वाली प्रतियोगिता में विजेता कैसे बने? यदि नहीं तो हम आपको बताए देते हैं कि डी उदया कुमार डीएमके के पूर्व विधायक धर्मालिंगम के पुत्र है जो उस समय केंद्र में सत्तारूढ़ कांग्रेस की सरकार में शामिल थी। डी उदया कुमार किस प्रकार नियमों का खुलेआम उल्लंघन करके इस प्रतियोगिता के विजेता बन गए इसे जानने के लिए पढ़िए "तहलका" का १५ अप्रैल का अंक। "तहलका" संवाददाता राहुल कोटियाल की इस रिपोर्ट से आपको पता चलेगा कि ये राजनेता अपने राजनैतिक लाभ के लिए किस हद तक गिर सकते हैं।

सोमवार, 15 अप्रैल 2013

चूक गए चौहान

 म.प्र. के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपनी बेदाग छवि के लिए भले ही जाने जाते हों परन्तु भोपाल की रोहित नगर सोसायटी घोटले ने उनकी छवि पर दाग ज़रूर लगाया है। अपने मंत्रियों और नौकरशाहों पर लगाम ना लगा पाने के कारण समय-समय पर उनकी आलोचना होती रही है। पूर्व में भी डंपर कांड को लेकर वो विपक्ष के निशाने पर थे। इस पूरे मामले में भी उनकी छवि धूमिल हुई थी। हाल ही में खोजी पत्रिका "तहलका" ने अपने ताज़ा अंक में भोपाल की रोहित नगर सोसायटी के घोटाले से संबंधित तथ्यों का उल्लेख किया है वे निश्चित ही चौंकाने वाले हैं। इसमें सीधे तौर पर भले ही मुख्यमंत्री शिवराज सिंह  चौहान पर आरोप ना लगाया गया हो परन्तु विपक्ष और मीडिया ने उन्हें संदेह व सवालों के घेरे में अवश्य ही खड़ा कर दिया है। सबसे चौकाने वाली बात है कि शिवराज सिंह की ओर से इस मामले को लेकर अब तक कोई भी स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है। मध्यप्रदेश में कुछ ही महीनों बाद चुनाव होने वाले हैं यदि मुख्यमंत्री का यही रवैया रहा तो हो सकता है कि पांव-पांव वाले भैया के लिए तीसरी बार सत्ता की दौड़ कांटो भरी होगी।

(रोहित नगर सोसायटी घोटाले के बारे में विस्तार से जानने के लिए "तहलका" पत्रिका का १५ अप्रैल २०१३ का अंक देखें या नीचे दिये गए लिंक पर क्लिक करें।)

http://www.tehelkahindi.com/indinoo/national/1727.html

बुधवार, 10 अप्रैल 2013

ताजमहल या तेजो महालय.....!


प्रो.पुरूषोत्तम नागेश ओक (पी.एन.ओक) ने अपनी पुस्तक "ताजमहल; तेजोमहालय शिव मन्दिर है"व "भारतीय इतिहास की भयंकर भूलें"में ताजमहल को शिव मन्दिर के रूप में मान्यता दी है। इस तथ्य के परीक्षण के लिए ये पुस्तकें पढ़ें और नीचे दिया गया लिंक देखें-
http://www.youtube.com/watch?v=bR4dNufCr8c

(निवेदन-इस लिंक से हमारा उद्देश्य किसी व्यक्ति, धर्म या संप्रदाय की भावनाएं आहत करना नहीं है। ना ही ये वीडियो हमारे द्वारा अपलोड किया गया है। हमारा उद्देश्य श्री पी.एन.ओक द्वारा अपनी पुस्तक "भारतीय इतिहास की भयंकर भूलें" व "ताजमल-तेजोमहालय शिव मन्दिर है" में उद्धत तथ्यों से आपको परिचित करवाना है। हम इन तथ्यों की प्रामाणिकता के बारे में कोई दावा नहीं करते।)

सोमवार, 8 अप्रैल 2013

शेर अर्ज़ किया है...

" इक हसीं हमसफ़र की तौफ़ीक दे दे
  मैंने कब तुझसे हरम मांगा है"

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"मैं आज तेरा हमसफ़र ना सही
 कभी हम दो कदम साथ चले थे"

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"तुम मेरे नक्शे-पा मिटाते हुए चलना
 कोई और ना मेरे बाद कांटों से गुज़रे"

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" अदब-औ-मुहब्बत से मिलो सबसे
  जाने कौन सी मुलाकात आखिरी हो"
 
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"गर तू खुद को दानां समझता है
 पढ़ मेरी आंखों में मेरे दिल को "

-हेमन्त रिछारिया

शुक्रवार, 5 अप्रैल 2013

फथपुर सीकरी बना फतेहपुर सीकरी -

श्री पी.एन.ओक की पुस्तक "भारतीय इतिहास की भयंकर भूलें" नामक पुस्तक के कुछ तथ्य निश्चित ही अकाट्य व सहज ग्राह्य हैं जैसे- यह तथ्य भी सहज ही ग्राह्य होने जैसा है कि जो भी मकबरे वर्तमान में जिस शहंशाह के नाम से संबंधित है उसी शंहशाह के महल का कहीं कोई वर्णन क्यों नही मिलता? वहीं अधिकतर स्मारकों व नगरों का हिन्दू नामों के समकक्ष व संस्क्रत का अपभ्रंश होना व इनके शासकों का इन्हें अपने नाम से जोड़ना। इसके कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं-
१.फतेहपुर सीकरी- फथपुर सीकरी-सीकरी शब्द सीकर से बना है जो कि संस्क्रत के शब्द "सिकता" से संबंधित है जिसका अर्थ है-रेत। राजस्थान के एक प्रमुख स्थान को "सीकर" के नाम से पुकारा जाता है। सीकर से आए हुए व्यक्तियों के लिए ही "सीकरी" शब्द प्रयुक्त होता था। संस्क्रत में "पुर" प्रत्यय भी बस्ती का द्योतक है। इससे यह सिद्ध होता है यह नगर एक राजपूत नगर था जो बाद में विजित होकर "फतेहपुर सीकरी" बना।
२. अहमदाबाद-(अहमद शाह)-कर्णवती या राजनगर
३. औरंगाबाद-(औरंगज़ेब)-कटकी या खड़की
४. होशंगाबाद-(होशंगशाह)-नर्मदापुर
५. अहमनगर-अम्बिका नगर
६. अजमेर- अजय मेरू
७. आगरा- अग्र

"भारतीय इतिहास की भयंकर भूलें"-(प्र.क्रं.-६४-७४)

बुधवार, 3 अप्रैल 2013

लाल किला या लाल कोट

मित्रों हाल ही में पी.एन.ओक की पुस्तक "भारतीय इतिहास की भयंकर भूलें" पढ़ी। इसे पढ़कर मेरे मस्तिष्क के तंतु झनझना उठे और मन अत्यंत पीड़ा से भर गया। इस पुस्तक को पढ़ने के उपरांत जो तथ्य जानकारी में आए उनसे यह स्पष्ट होता है कि किस प्रकार हमारे अपने स्मारकों,भवनों,महलों व मन्दिरों को विदेशी मुस्लिम आक्रांताओं ने अपनी आरामगाह व इबादत स्थल बनाकर उन्हें अपने नाम से दुष्प्रचारित किया है। इतना नहीं हमारे पूरे इतिहास के वास्तविक तथ्यों से छेड़छाड़ कर उसे विक्रत कर दिया। आज़ाद भारत के प्रथम शासक इस बात से अनजान बने अपनी आंखों पर पट्टी बांधे रहे। जिनका दायित्व सबसे पहले भारतीय इतिहास को पुनर्जीवित करने का था। वे इस प्रकार के दुष्प्रचार के प्रति अत्यंत उदासीन रहे। इसका असर यह हुआ कि आज हम उन्हीं दुष्प्रचारों को प्रामाणिक तथ्य मानकर स्वीकार किए हुए हैं। आज की पीढ़ी ऐसे ही दुष्प्रचारों को वास्तविक व प्रामाणिक तथ्य मानकर समादर देती जा रही है और शायद आने वाली पीढ़ियां भी देती रहेंगी। आज हम अपने उन स्मारकों के वास्तविक रूप व निर्माताओं से अनजान हैं जो कभी हमारे देश का गौरव हुआ करते थे। ऐसे कुछ स्मारकों की चर्चा मैं यहां करना चाहता हूं व उनके वास्तविक रूप से आपका परिचय करवाना चाहता हूं। ये सभी तथ्य उसी पुस्तक से लिए गए हैं जिसका उल्लेख मैंने पूर्व में किया है। यहां मेरा उद्देश्य आप सभी मित्रों को उस पुस्तक को पढ़ने के लिए प्रेरित करना है, जिसका नाम है-"भारतीय इतिहास की भयंकर भूलें"। तो आईए जानते है उन स्मारकों के बारे में-
 स्मारक--वास्तविक रूप व नाम-
१. ताजमहल--राजपूताना महल जिसमें शिव मन्दिर था-तेजोमहालय
२. लाल किला--राजा प्रथ्वीराज का महल-लाल कोट
३. कुतुबमीनार--नक्षत्र विद्याध्ययन के लिए बनाय गया वेध-स्तंभ जिसका प्रयोग विक्रमादित्य के 
                       --विश्वविख्यात  ज्योतिषी "मिहिर" किया करते थे।
४. डल झील--दल झील (पत्ता या पल्लवगुच्छ)
५. सोनमर्ग--स्वर्ण मार्ग
६. गुलमर्ग--गौरिमार्ग
७. वेरिनाग--वारिनाग (संस्क्रत का शब्द जो "जल-सर्प" का द्योतक है)
८. शेख सल्ला दरगाह--पुण्येश्वर व नारायणेश्वर मन्दिर पूना में स्थित
ये तो बस बानगी है ऐसे कई उदाहरणों के लिए पढ़िए "भारतीय इतिहास की भयंकर भूलें" लेखक पी.एन.ओक।

मंगलवार, 2 अप्रैल 2013

संजय दत्त को नहीं मिलेगी माफ़ी..!

 यदि पूरे घटनाक्रम को ज्योतिषीय नज़र से देखें तो संजय दत्त इस समय गुरू की महादशा और राहु की अंतर्दशा भोग रहे हैं। जो २४ अप्रैल २०१४ तक रहेगी। संजय दत्त की कुण्डली में गुरू ना सिर्फ द्वादश स्थान अर्थात कारावास के स्थान का स्वामी है बल्कि दण्डाधीश शनि अधिष्ठित राशी का स्वामी भी है। अंतर्दशानाथ राहु गुरू से द्वादश स्थान में स्थित है। जो अपनी भुक्ति में मानहानि व विपत्ति का संकेत दे रहा है। वहीं गोचर में भी राहु के अनिष्ट भाव में भ्रमण होने से उक्त बातें प्रमाणित हो रही है। गोचर में गुरू व्रष राशि में स्थित है अपनी राशि से गुरू का प्रथम भाव में गोचर संजय दत्त के लिए अनिष्टफलकारक है जो राजभय व मानहानि व अपने घर से दूर निवास का संकेत दे रहा है। जन्मकालीन गुरू पर से वर्तमान में शनि-राहु गोचर कर रहे हैं इस गोचर से भी मानहानि-राजभय का संकेत मिल रहा है। इसलिये इस अवधि में उनके कारावास जाने के प्रबल योग हैं। उन्हें अल्प समय के लिए ही सही जेल जाना ही होगा। अप्रैल २०१४ के बाद उनकी सज़ा माफ़ हो सकती है और वे रिहा हो सकते हैं।
 
*(उक्त गणना एक पत्रिका से प्राप्त कुण्डली के आधार पर की गई है जो संजय दत्त की बताई गई है। इसकी प्रमाणिकता के बारे में हम कोई दावा नहीं करते। यह उस कुण्डली का फलादेश है।)

सोमवार, 1 अप्रैल 2013

संजय दत्त को माफ़ी क्यों...?

 प्रेस काउंसिल के अध्यक्ष व सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस मार्कण्डेय काटजू ने संजय दत्त की माफ़ी को लेकर मुहिम क्या शुरू की सत्तारूढ़ दल कांग्रेस ने भी उनके सुर में सुर मिला दिया। इस मुहिम का फायदा भले ही कांग्रेस व जस्टिक काटजू को मिले ना मिले पर इसका अच्छा-खासा नुकसान संजय दत्त को ज़रूर भुगतना पड़ेगा। ये बात शायद संजू बाबा भी बखूबी जानते हैं तभी तो उन्होंने पत्रकार वार्ता में हाथ जोड़कर इस मुहिम से छिड़ी बहस को तत्काल बंद करने के लिए बड़ी ही आर्त गुहार लगाई। माफ़ी की इस मुहिम ने जहां एक ओर इस देश की जनता की याददाश्त पे पड़ी गर्द को साफ किया वहीं आम नागरिकों व बुद्धिजीवियों को इस बात पर सोचने के लिए विवश भी किया कि क्या वाकई संजय दत्त निर्दोष या मासूम हैं?आए दिन मीडिया में हो रहे खुलासों को देखकर तो यही लगता है कि संजय दत्त ने मुंबई बम कांड की साजिश में भले ही हिस्सा ना लिया हो पर उन्होंने इसे रोकने की दिशा में कोई सार्थक पहल भी नहीं की थी। उस समय लगभग ३४ साल के इस तथाकथित मासूम ने ना सिर्फ अबू सलेम जैसे अपराधी को अपने घर बुलाया वरन बमकांड के गुनहगारों से लगातार संपर्क बनाए रखा, इतना ही नहीं जमानत पर रिहा होने के बावज़ूद भी उसके यह संबंध जारी रहे। काटजू साहब ने बैठे बिठाए संजय दत्त की छवि की जो गत बनाई है उसे शायद ही कोई सुधार पाए। उनकी इस मुहिम से मीडिया को लंबे समय तक चलने वाला मसाला मिल गया और देश की जनता जो धीरे-धीरे इस गुनाह की गंभीरता को भूलती जा रही थी उसे भी एक ही झटके में सब कुछ याद दिला दिया। जो नागरिक संजू बाबा के साथ सहानुभूति रखने लगे थे इन कुछ दिनों में वे आए दिन होने वाले खुलासो को देखकर अपने आप को ठगा सा महसूस करने लगे हैं। वहीं कुछ विद्वान जो माफ़ी के पक्षधर हैं ये कहते नहीं थकते कि सजा तो वे पिछ्ले २० सालों से भुगत रहे हैं। अब ज़रा इन २० सालों पर भी गौर करें तो आप पाएंगे कि इन गुज़रे बीस सालों में संजय दत्त विवाह बंधन में बंध चुके हैं। उनकी २ संताने हो चुकी हैं। वे कई फिल्में भी साइन कर चुके हैं। कुछ फिल्में रिलीज़ होने के साथ-साथ सुपरहिट भी हो चुकी है जिससे उनके करियर में उन्नति हुई है। वो कई बार शूटिंग के सिलसिले में विदेश की सैर भी कर चुके हैं। एक राजनीतिक दल में शामिल होकर महासचिव का पद भी संभाल चुके हैं। यदि इन्ही सब बातों को सज़ा भुगतना कहते हैं तो ईश्वर से ऐसी सज़ा कौन नहीं चाहेगा। मेरा मानना है कि जो अच्छी छवि व सहानुभूति एक गुनहगार को अपने गुनाह को कबूल करके व उसके प्रायश्चित स्वरूप मिली उस गुनाह की सज़ा को भुगत कर प्राप्त होती है वह इस प्रकार रसूख का इस्तेमाल करके मिली माफ़ी से प्राप्त नहीं होती। संजय दत्त के शुभचिंतको को चाहिए कि वे उन्हें सज़ा भुगत कर प्रायश्चित करने दें जिससे इस देश की जनता उन्हें ह्रदय से माफ़ कर सके।