मंगलवार, 12 मार्च 2013

होली के दोहे

"सरल-चेतना" के पाठकों को होली की हार्दिक शुभकामनाएं-संपादक



बरस नया ले आ गया, रंगो का त्यौहार
चटक-मटक गोरी फिरे,पिया करे मनुहार।


बागों में रंग नाचते, सतरंगी सी शाल
फागुन थिरका पास में दहक उठे हैं गाल।


यह यायावर ज़िंदगी चलते-फिरते पांव
भर पिचकारी मार दे आए तेरे गांव।


दहक रहा टेसू खड़ा घूंघट में है पीर
बंधन सारे तोड़ कर गोरी हुई अधीर।


कजरारे नयना हंसे गाल बने गुलाब
रंग गुलाबी मन हुआ मिलने को बेताब।


गली-गली में हंस रहा यह रंगीला मास
फूलों के मधु गंध पर पिया नहीं है पास।


फागुन के दिन चार है, खुलकर खेलो फाग
रंगो का त्यौहार है,तन-मन दहके आग।


केशर से रंगी बदन,कस्तूरी सी रात
पायल बिछुए कर रहे चुपके-चुपके बात।

-प्रेमचंद सोनवाने

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