शुक्रवार, 15 मार्च 2013

संगीत सम्राट "तानसेन" द्वारा रचित गणेश-वन्दना


उठि प्रभात सुमरियै, जै श्री गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥
अन्धन को नेत्र देत, कुष्ठी को काया।
बन्ध्या को पुत्र देत, निर्धन को माया॥
एकदन्त दयावन्त, चार भुजा धारी।
मस्तक सिन्दूर सोहै, मूसक असवारी॥
फूल चढ़ै पान चढ़ै, और चढ़ै मेवा।
मोदक को भोग लगे, सुफल तेरी सेवा॥
रिद्धि देत सिद्धि देत, बुद्धि देत भारी।
"तानसेन" गजानन, सुमिरौ नर-नारी॥

 

 - तानसेन

तानसेनः एक परिचय

तानसेन
नाम-त्रिलोचन पांडे (तनसुख, तन्ना) तानसेन
पिता का नाम- मकरन्द पांडे
माता का नाम- कमला पांडे
जन्म स्थान- बेहट गांव (ग्वालियर से २८ मील दूर दक्षिण-पूर्व में स्थित)
पत्नी का नाम- हुसैनी व मेहरून्निसा (मेहर) अकबर की पुत्री
पुत्र-               तानतरंग,विलास खां,हमीरसेन,सूरतसेन
पुत्री-             सरस्वती
दामाद-         मिसरी सिंह
राज दरबारी गायक- १. राजा मानसिंह तोमर (ग्वालियर)
                               २. राजा रामचंद्र बघेल (रीवा नरेश)
                               ३. शहंशाह अकबर (हिंदुस्तान) के नौ रत्नों में से एक
रचित ग्रंथ-              १. संगीत सार
                               २. रागमाला
                               ३. गणेश स्तोत्र

शहंशाह अकबर के नौ रत्न

अकबर

१. राजा बीरबल
२. राजा मानसिंह कछवाहा
३. राजा टोडरमल
४. तानसेन
५. हकीम हुमाम
६. मुल्ला दोप्याजा
७. मलिकुश्शरा फैज़ी
८. अबुल फज़ल
९. अब्दुल रहीम खानखाना

मंगलवार, 12 मार्च 2013

होली के दोहे

"सरल-चेतना" के पाठकों को होली की हार्दिक शुभकामनाएं-संपादक



बरस नया ले आ गया, रंगो का त्यौहार
चटक-मटक गोरी फिरे,पिया करे मनुहार।


बागों में रंग नाचते, सतरंगी सी शाल
फागुन थिरका पास में दहक उठे हैं गाल।


यह यायावर ज़िंदगी चलते-फिरते पांव
भर पिचकारी मार दे आए तेरे गांव।


दहक रहा टेसू खड़ा घूंघट में है पीर
बंधन सारे तोड़ कर गोरी हुई अधीर।


कजरारे नयना हंसे गाल बने गुलाब
रंग गुलाबी मन हुआ मिलने को बेताब।


गली-गली में हंस रहा यह रंगीला मास
फूलों के मधु गंध पर पिया नहीं है पास।


फागुन के दिन चार है, खुलकर खेलो फाग
रंगो का त्यौहार है,तन-मन दहके आग।


केशर से रंगी बदन,कस्तूरी सी रात
पायल बिछुए कर रहे चुपके-चुपके बात।

-प्रेमचंद सोनवाने

बुराईयों के अंत का प्रतीक है होली



डा.जगदीश गांधी
होली भारत के सबसे पुराने पर्वों में से एक है। होली की हर कथा में एक समानता है कि उसमें "असत्य पर सत्य की विजय" और "दुराचार पर सदा़चार की विजय" का उत्सव मनाने की बात कही गई है। इस प्रकार होली मुख्यतः आनंदोल्लास तथा भाई-चारे का त्यौहार है। यह लोक पर्व होने के साथ ही अच्छाई की बुराई पर जीत सदाचार की दुराचार पर जीत व समाज में व्याप्त समस्त बुराईयों के अंत का प्रतीक है। ऐसा माना जाता है कि होली के दिन लोग पुरानी कटुता व दुश्मनी को भूलकर एक-दूसरे से गले मिलते हैं।
 किसी कवि ने कहा है-
         "नफरतों के जल जाएं सब अंबार होली में,
         गिर जाए मतभेद की हर दीवार होली में।
         बिछुड़ गए जो बरसों से प्राण से अधिक प्यारे,
         गले मिलने आ जाएं वे इस बार होली में॥

-डा.जगदीश गांधी
संस्थापक-प्रबंधक
सिटी मान्टेसरी स्कूल, लखनऊ (उ.प्र.)

नक्षत्र पुरूष-"बाबूजी"

बाबूजी
जीवन में यूं तो हम बहुत से लोगों से मिलते हैं, पर उनमें से कुछ लोग ऐसे होते हैं जो आपके दिल में उतरकर आपके जीवन को एक नई दिशा दे जाते हैं। ऐसे ही लोगों को हरिवंशराय बच्चन ने अपनी आत्मकथा "बसेरे से दूर" में "नक्षत्र-पुरूष" कहा है। ऐसे ही एक नक्षत्र-पुरूष हैं-"बाबूजी" यानि श्री राधेश्यामजी रावल। जिन्हें हम सभी प्यार से "बाबूजी" कहते हैं। आपको बाबूजी से थोड़ा परिचित करा दूं। उम्र सत्तर वर्ष की करीब, लंबा कद,गठा हुआ संतुलित शरीर, कम बालों के कारण माथे पर चंद्र सी आभा है। आंखो पर चश्मा लगाते हैं और पेंट-शर्ट पहनते हैं। ज़्यादातर पैदल ही चलते हैं। उनकी मुस्कुराहट को देखकर मुझे किसी दार्शनिक की एक बात स्मरण हो आती है कि" अच्छे व्यक्तियों की सुंदरता बूढ़े होने पर भी विद्यमान रहती है बस ये उनके चेहरे से उतरकर उनके दिल में आ जाती है"। सादा-जीवन;उच्च विचार की जीवन्त प्रतिमूर्ति हैं "बाबूजी"। जीवन में कड़ा अनुशासन,असीम परोपकार से लबरेज़ जीवन शैली के धनी। वे जब तक यहां रहे हर सामाजिक कार्य में भागीदारी करते रहे। परोपकार को ही अपना धर्म माननेवाली कई संस्थाओं से उनका निकट का सम्बन्ध था। वे एक सच्चे स्वयंसेवक हैं। मैंने अपने जीवन में ऐसे बिरले ही देखें हैं जो इतनी विद्वता के साथ इतना सहज हो सकें। उनसे जब भी हम किसी विषय में कोई प्रश्न करते और यदि उन्हें पूरा पता नहीं है तो वे अत्यंत सहज स्वर में प्रतिउत्तर देते कि "मुझे इस विषय में जानकारी नहीं है, या कम है"। उनकी समय की पाबन्दी तो देखते ही बनती है, उनके समय संबधी अनुशासन से आप घड़ी मिला सकते हैं। छोटी-छोटी गोष्ठियों का उन्हें बड़ा शौक है। वे आए दिन अपने निवास पर गोष्ठियां आयोजित करते रहते हैं। गोष्ठी का निमंत्रण देने वे स्वयं उस मित्र के घर तक जाते हैं जिसे वे आमंत्रित कर रहे हों। एक बार मैंने उनसे निवेदन किया कि "बाबूजी मोबाइल का ज़माना है आप फोन कर दिया करो।" तो उनका उत्तर था कि "ये शिष्टाचार के नियमों के विरूद्ध है।" वे स्वयं अपने हाथों से स्वल्पाहार भी परोसते। "बाबूजी" बहुत अच्छा गाते हैं। हारमोनियम भी खुद ही बजाते हैं। श्रेष्ठ साहित्य में उनकी रूचि है। उनकी डायरी में कई कवियों की उत्क्रष्ट रचनाओं है। उनके पास अत्यंत दुर्लभ श्रेष्ठ साहित्य का विशाल संग्रह है। जिसे वे मित्रों के लिए सदा उपलब्ध रखते। ये समझ लीजिए कि वे निजी तौर पर एक पुस्तकालय ही चलाते हैं जो पूर्णतः निशुल्क है। ना जाने कितने मित्रों को उन्होंने श्रेष्ठ पुस्तकों से परिचित करवाया है। खैर... मिलना-बिछुड़ना तो जीवन-धारा का ही एक रूप है जिसमें प्रिय का मिलन और विछोह; नदी-नाव-संयोग की तरह ही होता है। जिसे हमें स्वीकार करना होता है। "बाबूजी" हमारे दिल में सदा बसे रहेंगे। ईश्वर से मेरी यही प्रार्थना है कि वो हम सबके प्यारे "बाबूजी" को दीर्घायु व उत्तम स्वास्थ्य प्रदान करे।