गुरुवार, 7 फ़रवरी 2013

बसेरे से दूर

बीच खड़ी हैं हम दोनों के
अभी न जाने कितनी रातें,
अभी बहुत दिन करनी होंगी
केवल इन गीतों में बातें।

कितनी रंजित प्रात; उदासी
में डूबी कितनी संध्याएं,
सब के बीच पिरोना होगा,प्रिय हमको धीरज का धागा।
याद तुम्हारी लेकर सोया, याद तुम्हारी लेकर जागा॥

-डा.हरिवंशराय बच्चन
(साभार-बसेरे से दूर)

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