शनिवार, 9 फ़रवरी 2013

कौन श्रीकृष्ण सरल?


"नहीं महाकवि और न कवि ही लोगों द्वारा कहलाऊं
सरल शहीदों का चारण था कहकर याद किया जाऊं"
यह अभिलाषा थी राष्ट्रकवि श्रीकृष्ण "सरल" की। क्या.....कौन श्रीकृष्ण "सरल"? यह हमारी विडंबना ही है कि जिस व्यक्ति ने सारा जीवन सिर्फ़ और सिर्फ़ क्रांतिकारियों के योगदान को हम तक पहुंचाने के लिए लगा दिया। जिसने अपने परिवार की खुशियां, पत्नी के गहने यहां तक कि स्वयं की जान भी दांव पर लगा दी,उसका आज हम परिचय पूछते हैं। हालांकि वो किसी परिचय का मोहताज नहीं, वह तो स्वयं परिचय है राष्ट्रनिष्ठा का, देशप्रेम का, श्रद्धा और समर्पण का। सरल जी का कहना था कि मैं क्रांतिकारियों पर इसलिए लिखता हूं ताकि आने वाली पीढ़ियों को कृतघ्न ना कहा जाए।‍ "जीवित-शहीद" की उपाधि से अलंक्रत श्रीकृष्ण  "सरल"  सिर्फ नाम के ही सरल नहीं थे, सरलता उनका स्वभाव थी। राष्ट्रकवि श्रीकृष्ण  "सरल"  का जन्म १ जनवरी १९१९ को म.प्र. के गुना जिले के अशोकनगर में हुआ था। उनके पिता का नाम पं. भगवती प्रसाद बिरथरे और माता का नाम यमुना देवी था। जब सरलजी पांच वर्ष के थे तभी उनकी माता का देहांत हो गया था। आपने लगभग दस वर्ष की उम्र में काव्य-लेखन प्रारंभ कर दिया था। प्रारंभ से ही आपकी रूचि राष्ट्रीय लेखन एवं क्रांतिकारियों के जीवन में रही। आपने निजी व्यय से करीब बीस लाख किलोमीटर की यात्रा क्रांतिकारियों के जीवन को खंगालने के उद्देश्य से की। १५ महाकाव्यों का लेखन करने वाले इस महान कवि ने अपने निजी व्यय से १२५ पुस्तकें,४५ काव्य-ग्रंथ,४ खंड काव्य,३१ काव्य संकलन,८ उपन्यास का प्रकाशन किया। शासन की ओर से उन्हें ना तो कोई सहयोग मिला और न ही शासन ने उनके लिखे साहित्य के विक्रय में कोई रूचि दिखाई। सौतेले व्यवहार में समाज के चौथे स्तंभ कहे जाने वाले पत्रकारिता जगत ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी। शायद श्रीकृष्ण  "सरल"  तथाकथित समालोचकों एवं पत्रकारों की दृष्टि में महान साहित्यकारों की श्रेणी में नहीं आते। ठीक भी है, ऐसे कार्य महान व्यक्ति नहीं अपितु दीवाने ही कर पाते हैं। देशभक्ति और भारतमाता के सपूतों के प्रति श्रद्धावनत "सरल"जी से बड़ा दीवाना और कहां? निश्चय ही सरल जी की काव्य यात्रा एक दीवानापन था; वैसा ही दीवानापन जैसा कबीर में था, मीरा में था और उसे समझने और महसूस करने के लिए बुद्धि से अधिक ह्रदय की आवश्यकता होती है। आज ह्रदय पाषाण होते जा रहे हैं। अगर इसी तरह चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब देशप्रेम;बलिदान;राष्ट्रनिष्ठा ये बातें सिर्फ पागलपन का पर्याय बनकर रह जाएंगी और इनके लिए कोई अपने प्राण दांव पर नहीं लगाएगा। सरल जी की यही चिन्ता उनकी काव्य-यात्रा में सर्वत्र परिलक्षित होती है।
वे कहते हैं- "पूजे ना गए शहीद तो फिर आजादी कौन बचाएगा?
                  फिर कौन मौत की छाया में जीवन के रास रचाएगा?"

-हेमंत रिछारिया

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