रविवार, 10 फ़रवरी 2013

सिंह जननी

धूम धरती पर मचा विद्रोह का वरदान,
यहां मेरे दूध का सोया अजस्र उफान।
सो गया उल्लास मेरा सो गया आमोद,
एक मां की गोद तज कर; दूसरी की गोद।

ओज अंतस कर यहां कर रहा विश्राम,
वत्स! तुमको क्या बता दूं उस हठी का नाम?
लाल वह मेरा "भगत"; था सिंह ही साकार,
जन्म से ही कहाया गया था वह सरदार।

गर्जना उसकी विकट सुन, कांपते थे लाट,
निर्धना मैं; वह शहीदों का बना सम्राट।
सुन लिया क्या और परिचय रह गया कुछ शेष?
यहां मेरी भावना का सो रहा आवेश।
-सरलजी

कोई टिप्पणी नहीं: