रविवार, 10 फ़रवरी 2013

"मैं दंबूक बोदां हां"

पीठ थपथपा पूछ रहे-"बेटे ! तुम क्या करने बैठे?
कुआं खोद कर क्या तुम उसमें हो पानी भरने बैठे?
"नहीं;नहीं; चाचाजी ! मैं तो अच्छा बाग लगाऊंगा।
मैं दंबूक (बंदूक) बो रहा, दंबूकों का पेड़ उगाऊंगा।"

"अच्छा तुम बंदूक बो रहे पर फल किसे चखाओगे?
क्या चिड़ियों के छोटे-छोटे बच्चे मार गिराओगे?"
"दंबूकों के फल चाचाजी मेरे दुश्मन खाएंगे,
चिड़िया के बच्चे तो मेरे साथ खेलने आएंगे।

"मुन्ने कौन तुम्हारा दुश्मन यह भी तो बतलाओ
चले निशाना किसे बनाने,यह भी मुझको समझाओ।"
"राज कर रहे जो भारत पर, वे सब अपने दुश्मन हैं
उन्हें भगा कर अपनी मां के हमें काटने बंधन हैं।"

-सरलजी
(भगतसिंह के पिता के मित्र श्री आनन्दकिशोर मेहता जो कांग्रेस कमेटी के मंत्री थे। उन्होंने भगतसिंह को खेत में बंदूक गड़ाते देखा। प्रश्न करने पर भगतसिंह ने उत्तर दिया "मैं दंबूक बोदां हां"। उस समय बाल भगत बंदूक को "दंबूक" कहता था।)

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