रविवार, 24 फ़रवरी 2013

ग़ज़ल

वक्त ने छोड़े हैं ऐसे अपने निशां
आईना देखते हैं तो डर जाते हैं

तू खुद को ना ख़तावार समझ
ये दीदें पराए गम से भर जाते हैं

तन्हा दीवारों से सिवा कुछ नहीं
कहने को हम भी "घर" जाते हैं

ताब-ए-सब्र पे यकीं है लेकिन
कुछ बोल हैं जो अखर जाते हैं

गुलों की दोस्ती में फा़सला रखना
नाज़ुक छुअन से बिखर जाते हैं

तेरा आस्तां ही अपनी मंज़िल है
लोगों से क्या कहें किधर जाते हैं

मादरे-वतन पे जिनको नाज़ नहीं
उनके अंजाम से सिहर जाते हैं

-हेमन्त रिछारिया

गुरुवार, 14 फ़रवरी 2013

यौवन

यौवन क्या है? यह लपटों का संगम है
सरगम है ये अन्तर के तूफानों का,
यौवन अरमानों का सर्वोच्च शिखर है
है पुण्य-पर्व यह यौवन बलिदानों का।

क्या बात करें यौवन के दीवानों की
ज्वालामुखियों पर रास रचाते हैं वे,
देना पड़ता मस्तक तो दे देते वे
मस्तक देकर सम्मान बचाते वे।
-सरलजी

रविवार, 10 फ़रवरी 2013

नेताजी नहीं थे "गुमनामी बाबा"

कुछ दिनों पहले एक प्रतिष्ठित न्यूज़ चैनल के कार्यक्रम में नेताजी सुभाषचंद्र बोस की बेटी अनीता बोस का साक्षात्कार प्रसारित किया गया। जब उनसे गुमनामी बाबा के नेताजी होने के संबंध में पूछा गया तो उनका उत्तर था-"मैं उनसे मिली थी और मैंने एक क्षण में ही यह जान लिया था कि वो मेरे पिता नहीं हैं।"
-संपादक (जैसा मैंने सुना)

वनफूल

उपवन के सुमनों ने सम्मान सदा पाया
किसने जाना कब कौन कहा वनफूल खिला,
किसने जाना कब महका वह कब मुरझाया
कब बिखर धूल में वह अनदेखा फूल मिला।

इस भारत उपवन में जाने कितने वन-फूल खिले
वे अनदेखे-अनजाने ही चुपचाप झड़े,
माताओं के लाड़ले लाल जाने कितने
आज़ादी की मंज़िल के नीचे दबे पड़े।
-सरलजी

जय नाद

कर्तव्य कह रहा चीख-चीख कर यह हमसे
हर एक सांस को एक सबक यह याद रहे,
अपनी हस्ती क्या, रहें;रहें या नहीं रहें
यह देश रहे आजाद, देश आजाद रहे।

इस देह धर्म के नाते हमको जाना है
कुछ ऐसा करके जाएं अपनी याद रहे,
आज़ाद रहे; आज़ाद रहे धरती-माता
जग से गुंजित इस माता जय नाद रहे।
-सरलजी

सिंह जननी

धूम धरती पर मचा विद्रोह का वरदान,
यहां मेरे दूध का सोया अजस्र उफान।
सो गया उल्लास मेरा सो गया आमोद,
एक मां की गोद तज कर; दूसरी की गोद।

ओज अंतस कर यहां कर रहा विश्राम,
वत्स! तुमको क्या बता दूं उस हठी का नाम?
लाल वह मेरा "भगत"; था सिंह ही साकार,
जन्म से ही कहाया गया था वह सरदार।

गर्जना उसकी विकट सुन, कांपते थे लाट,
निर्धना मैं; वह शहीदों का बना सम्राट।
सुन लिया क्या और परिचय रह गया कुछ शेष?
यहां मेरी भावना का सो रहा आवेश।
-सरलजी

भगतसिंह की माताजी

                                शहीदे-आज़म भगतसिंह की माताजी देवी विद्यावती जी के साथ सरलजीशहीदे-आज़म भगतसिंह की माताजी देवी विद्यावती जी के साथ सरलजी

"मैं दंबूक बोदां हां"

पीठ थपथपा पूछ रहे-"बेटे ! तुम क्या करने बैठे?
कुआं खोद कर क्या तुम उसमें हो पानी भरने बैठे?
"नहीं;नहीं; चाचाजी ! मैं तो अच्छा बाग लगाऊंगा।
मैं दंबूक (बंदूक) बो रहा, दंबूकों का पेड़ उगाऊंगा।"

"अच्छा तुम बंदूक बो रहे पर फल किसे चखाओगे?
क्या चिड़ियों के छोटे-छोटे बच्चे मार गिराओगे?"
"दंबूकों के फल चाचाजी मेरे दुश्मन खाएंगे,
चिड़िया के बच्चे तो मेरे साथ खेलने आएंगे।

"मुन्ने कौन तुम्हारा दुश्मन यह भी तो बतलाओ
चले निशाना किसे बनाने,यह भी मुझको समझाओ।"
"राज कर रहे जो भारत पर, वे सब अपने दुश्मन हैं
उन्हें भगा कर अपनी मां के हमें काटने बंधन हैं।"

-सरलजी
(भगतसिंह के पिता के मित्र श्री आनन्दकिशोर मेहता जो कांग्रेस कमेटी के मंत्री थे। उन्होंने भगतसिंह को खेत में बंदूक गड़ाते देखा। प्रश्न करने पर भगतसिंह ने उत्तर दिया "मैं दंबूक बोदां हां"। उस समय बाल भगत बंदूक को "दंबूक" कहता था।)

शनिवार, 9 फ़रवरी 2013

कौन श्रीकृष्ण सरल?


"नहीं महाकवि और न कवि ही लोगों द्वारा कहलाऊं
सरल शहीदों का चारण था कहकर याद किया जाऊं"
यह अभिलाषा थी राष्ट्रकवि श्रीकृष्ण "सरल" की। क्या.....कौन श्रीकृष्ण "सरल"? यह हमारी विडंबना ही है कि जिस व्यक्ति ने सारा जीवन सिर्फ़ और सिर्फ़ क्रांतिकारियों के योगदान को हम तक पहुंचाने के लिए लगा दिया। जिसने अपने परिवार की खुशियां, पत्नी के गहने यहां तक कि स्वयं की जान भी दांव पर लगा दी,उसका आज हम परिचय पूछते हैं। हालांकि वो किसी परिचय का मोहताज नहीं, वह तो स्वयं परिचय है राष्ट्रनिष्ठा का, देशप्रेम का, श्रद्धा और समर्पण का। सरल जी का कहना था कि मैं क्रांतिकारियों पर इसलिए लिखता हूं ताकि आने वाली पीढ़ियों को कृतघ्न ना कहा जाए।‍ "जीवित-शहीद" की उपाधि से अलंक्रत श्रीकृष्ण  "सरल"  सिर्फ नाम के ही सरल नहीं थे, सरलता उनका स्वभाव थी। राष्ट्रकवि श्रीकृष्ण  "सरल"  का जन्म १ जनवरी १९१९ को म.प्र. के गुना जिले के अशोकनगर में हुआ था। उनके पिता का नाम पं. भगवती प्रसाद बिरथरे और माता का नाम यमुना देवी था। जब सरलजी पांच वर्ष के थे तभी उनकी माता का देहांत हो गया था। आपने लगभग दस वर्ष की उम्र में काव्य-लेखन प्रारंभ कर दिया था। प्रारंभ से ही आपकी रूचि राष्ट्रीय लेखन एवं क्रांतिकारियों के जीवन में रही। आपने निजी व्यय से करीब बीस लाख किलोमीटर की यात्रा क्रांतिकारियों के जीवन को खंगालने के उद्देश्य से की। १५ महाकाव्यों का लेखन करने वाले इस महान कवि ने अपने निजी व्यय से १२५ पुस्तकें,४५ काव्य-ग्रंथ,४ खंड काव्य,३१ काव्य संकलन,८ उपन्यास का प्रकाशन किया। शासन की ओर से उन्हें ना तो कोई सहयोग मिला और न ही शासन ने उनके लिखे साहित्य के विक्रय में कोई रूचि दिखाई। सौतेले व्यवहार में समाज के चौथे स्तंभ कहे जाने वाले पत्रकारिता जगत ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी। शायद श्रीकृष्ण  "सरल"  तथाकथित समालोचकों एवं पत्रकारों की दृष्टि में महान साहित्यकारों की श्रेणी में नहीं आते। ठीक भी है, ऐसे कार्य महान व्यक्ति नहीं अपितु दीवाने ही कर पाते हैं। देशभक्ति और भारतमाता के सपूतों के प्रति श्रद्धावनत "सरल"जी से बड़ा दीवाना और कहां? निश्चय ही सरल जी की काव्य यात्रा एक दीवानापन था; वैसा ही दीवानापन जैसा कबीर में था, मीरा में था और उसे समझने और महसूस करने के लिए बुद्धि से अधिक ह्रदय की आवश्यकता होती है। आज ह्रदय पाषाण होते जा रहे हैं। अगर इसी तरह चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब देशप्रेम;बलिदान;राष्ट्रनिष्ठा ये बातें सिर्फ पागलपन का पर्याय बनकर रह जाएंगी और इनके लिए कोई अपने प्राण दांव पर नहीं लगाएगा। सरल जी की यही चिन्ता उनकी काव्य-यात्रा में सर्वत्र परिलक्षित होती है।
वे कहते हैं- "पूजे ना गए शहीद तो फिर आजादी कौन बचाएगा?
                  फिर कौन मौत की छाया में जीवन के रास रचाएगा?"

-हेमंत रिछारिया

मैं अमर शहीदों का चारण

राष्ट्रकवि श्रीकृष्ण "सरल"

मैं अमर शहीदों का चारण, उनके यश गाया करता हूं
जो कर्ज राष्ट्र ने खाया है, मैं उसे चुकाया करता हूं।
यह सच है याद शहीदों की हम लोगों ने दफ़नाई है
यह सच है उनकी लाशों पर चलकर आजादी आई है।

पूजे ना गए शहीद तो फिर आजादी कौन बचाएगा?
तोपों के मुंह से कौन अकड़ अपनी छातियां अड़ाएगा?
चूमेगा फंदे कौन; गोलियां कौन वक्ष खाएगा?
अपने हाथों अपने मस्तक फिर आगे कौन बढ़ाएगा?

पूजे ना गए शहीद तो फिर आजादी कौन बचाएगा?
फिर कौन मौत की छाया में जीवन के रास रचाएगा?
पूजे ना गए शहीद तो फिर यह बीज कहां से आएगा?
धरती को मां कहकर, मिट्टी माथे से कौन लगाएगा?

मैं चौराहे चौराहे पर ये प्रश्न उठाया करता हूं।
मैं अमर शहीदों का चारण उनके यश गाया करता हूं।
-सरलजी

जब मनुष्य असभ्य था तब नदियां स्वच्छ थी, आज मनुष्य सभ्य है तो नदियां अस्वच्छ और विषाक्त हैं-बेगड़ जी

दिनांक ८ फरवरी २०१३ को बान्द्राभान में तीसरे अंतर्राष्ट्रीय नदी महोत्सव का आयोजन किया गया। चार दिवसीय कार्यक्रम का शुभारंभ करते हुए नर्मदा समग्र के अध्यक्ष श्री अम्रतलाल बेगड़ जी ने कहा कि जब मनुष्य असभ्य था तब नदियां स्वच्छ थी। आज मनुष्य सभ्य है तो नदियां अस्वच्छ और विषाक्त हैं। उन्होंने कहा कि हमारी नदियों में रसायन बह रहा है। गंगा और यमुना आई.सी.यू में है। नदी और पेड़ के संबंध को व्यक्त करते हुए वे बोले कि नदी और पेड़ में भाई-बहन जैसा संबंध है। जैसे एक भाई अपनी बहन की रक्षा करता है ठीक वैसे ही पेड़ नदियों की रक्षा करतें हैं। यदि पेड़ ही ना होंगे तो नदियों को कौन बचाएगा। नदी प्रदूषण के लिए उन्होंने बढ़ती आबादी को जिम्मेवार बताया। उनके अनुसार बढ़ती जनसंख्या ने देश को नर्क बना दिया है और हमारी नदियों को प्रदूषित कर दिया है। वे कहते हैं कि नर्मदा ने मुझे कलाकार से लेखक बना दिया। उनका मानना है कि यदि कहीं नदियों की सौंदर्य प्रतियोगिता हो तो उसमें निश्चय ही नर्मदा को प्रथम स्थान प्राप्त होगा।

गुरुवार, 7 फ़रवरी 2013

बसेरे से दूर

बीच खड़ी हैं हम दोनों के
अभी न जाने कितनी रातें,
अभी बहुत दिन करनी होंगी
केवल इन गीतों में बातें।

कितनी रंजित प्रात; उदासी
में डूबी कितनी संध्याएं,
सब के बीच पिरोना होगा,प्रिय हमको धीरज का धागा।
याद तुम्हारी लेकर सोया, याद तुम्हारी लेकर जागा॥

-डा.हरिवंशराय बच्चन
(साभार-बसेरे से दूर)

बुधवार, 6 फ़रवरी 2013

हाइकु

तुझे देखते
आंखे नहीं अघातीं
चांद चेहरा

 ज़ुबानी घोड़ा
है सरपटा दौड़ा
खींचो लगाम

मन है चंगा
तो कठौती में प्यारे
मिलेगी गंगा

ऐसे मनाएं
अबके गणतंत्र
सुधारें तंत्र

-हेमन्त रिछारिया

आक्सफोर्ड और केम्ब्रिज की प्रतिद्वंद्विता-

कहते हैं कि"आक्सफोर्ड एक सिटी है जिसके बीच एक यूनीवर्सिटी बनी है। केम्ब्रिज एक युनिवर्सिटी है जिसके बीच एक सिटी बसी है।" १३वीं सदी के प्रारम्भ में आक्सफोर्ड युनिवर्सिटी के कुछ विद्यार्थी वहां से किसी कारण असंतुष्ट होकर केम्ब्रिज आये और यहां उन्होंने "स्टूडियम जनरेल" के नाम से एक शिक्षा-केन्द्र की स्थापना की, जिसे शताब्दी के तीसरे दशक के अन्त में युनिवर्सिटी के रूप में राजकाय मान्यता दी गई। आक्सफेर्ड वाले इसे बड़े अभिमान से कहते हैं कि केम्ब्रिज युनिवर्सिटी हमारी ही सन्तान है। उधर केम्ब्रिज वालों का दावा है कि ईस्ट ऐंग्लिया के राजा ने सातवीं शताब्दी में ही यहां एक स्कूल की स्थापना की थी जिसमें आक्सफोर्ड के विद्यार्थी आकर भर्ती हुए थे और बाद में उसी को "स्टूडियम जनरेल" का नाम दिया गया; उसी को केम्ब्रिज युनिवर्सिटी का। सच्चाई तो अतीत की धुंध में खो गई है पर अस्तित्व में आ गयी है-आक्सफोर्ड और केम्ब्रिज की प्रतिद्वंद्विता।

(साभारः बसेरे से दूर)
So like a bit of stone I lie
Under a broken tree,
I could recover if I shrieked
My heart's agony
To passing bird, but I am dumb
From human dignity.

-W.B.Yeats.

हिन्दी अनुवाद-

टूटे तरू के नीचे
छोटे से पत्थर सा;
पड़ा हुआ हूं मैं कब से
विजड़ित जड़िमा से।

मेरा दिल हल्का हो जाता,
डाली पर बैठी चिड़िया को
यदि मैं अपनी पीर सुनाता,
लेकिन मैं मुंह बन्द किये
मानव गरिमा से।
(अनुवादकः डा. हरिवंशराय बच्चन)