सोमवार, 7 जनवरी 2013

"विवाह": संबंध या समझौता?

संघ प्रमुख का "विवाह" पर दिया गया बयान एक बार फिर सुर्खियों में है। आजकल किसी बयान का "विवादास्पद" होना एक फैशन सा बनता जा रहा है। इसमें मीडिया के पंडितों की भी खासी भूमिका है। "विवाह" संबंध है या समझौता, ये हमारे विवाहित मित्रों से बेहतर और कौन जान सकता है। भले ही वे इसके सच को सार्वजनिक करने में संकोच करें। आचार्य रजनीश का कहना है -"विवाह प्रेम पर आधारित होना चाहिए।" परन्तु ज़रा हमारे आसपास हो रहे विवाहों का सूक्ष्मता से अवलोकन करके देखिए, क्या वे आपको प्रेम पर आधारित दिखाई देते हैं? आजकल विवाह "लाभ" पर आधारित होते हैं और जिसकी नींव में लाभ-हानि का गणित हो वो प्रेम-संबंध भला कैसे हो सकता है, हां व्यापारिक संबंध अर्थात "बिजनेस रिलेशन" भले ही हो सकता है। मेरे देखे यदि रति-सुख को बिना विवाह के सामाजिक स्वीक्रति व मान्यता प्राप्त हो जाए तो समाज से नब्बे प्रतिशत विवाह विदा हो जाएंगे। जिन देशों व संस्क्रतियों ने ऐसा किया है वहां विवाह गौण हो गया है। इसका मतलब यह नहीं कि मेरा विवाह नामक संस्था पर विश्वास व आस्था नहीं है;.....है। पूर्ण आस्था है, पर उसकी नींव में "प्रेम" होना चाहिए। कुछ तथाकथित विद्वानों मित्रों का मत है कि चूंकि संघ प्रमुख अविवाहित है इसलिए उन्हे इस विषय में बोलने का अधिकार नहीं है। यहां मैं उन तथाकथित विद्वान समालोचकों से कहना चाहूंगा कि महानुभाव विष पीने से प्राण-हानि होती है ये सब जानते और मानते है पर इस निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले कितनों ने विष पीकर देखा है? मेरा आशय यह है कि दूसरों की परीणति से भी तो सबक लिया जा सकता है। बहरहाल, मेरा संघ प्रमुख से यही निवेदन है कि इस प्रकार के कटु सत्यों के लिए अभी हमारा समाज तैयार नहीं है। अस्तु इस तरह के कड़वे सत्यों को उदघाटित ना करें तो बेहतर है क्योंकि- "उपदेशो हि मूर्खांनाम प्रकोपाय ना शान्तये। पयपानं भुजंगानाम केवल विषवर्धनम॥" इसका अर्थ है...........जाने दीजिए इसका अर्थ बताकर मैं एक नए विवाद को जन्म देना नहीं चाहता। -संपादक

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