शनिवार, 5 जनवरी 2013

"अति सर्वत्र वर्जयेत"

मित्रों, आज डा.बशीर बद्र का एक शेर याद आ रहा है कि "जी तो चाहता है कि सच बोलें,क्या करें हौंसला नहीं होता"आज कमोबेश हालात कुछ ऐसे ही हैं। आज हमारा समाज एक विक्रति की ओर अग्रसर है। आज के इस माहौल में कुछ भी बोलना जो व्यवहारिक हो आपको एक वर्ग विशेष का दुश्मन बना देता है। आज हम एक अति से दूसरी अति की ओर बढ़ रहे हैं। हमारे शास्त्रों में कहा गया कि "अति सर्वत्र वर्जयेत" अति सभी जगह बुरी होती है। अति स्वतंत्रता उच्छंखलता का रूप ले लेती है, अति विश्वास अंधविश्वास बन जाता है। मित्रों, वही पतंग आसमान की ऊंचाईयां छूती है जिसकी डोर किसी के हाथ में होती है, कटी पतंग जो कि पूर्ण स्वंतत्र होती है कुछ देर हवा में सैर भले ही कर ले पर उसकी परिणति ज़मीन पर धूल-धूसरित होकर ही होती है। यहां मुझे एक बोध कथा का स्मरण आ रहा है जो यहां प्रासंगिक है-"एक बार एक गुरू अपने शिष्य के साथ कहीं जा रहे थे। रास्ते में शिष्य ने गुरू से कहा कि गुरूदेव मार्ग में बड़े कांटे है तो गुरू ने उत्तर दिया कि खडाऊं पहन लो। इस पर शिष्य मार्ग के कांटो की ओर संकेत करता हुआ बोला-गुरूदेव मैं इन कांटों की बात नहीं कर रहा, इस पर गुरू ने अपने पैरों की ओर संकेत कर कहा कि- मैं भी इस खडाऊं की बात नहीं कर रहा।" गुरू और शिष्य दोनों एक दूसरे की बात भली-भांति समझ गए परन्तु हम और हमारा समाज ये बात ना जाने कब समझेगा? -संपादक

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