शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2012

सौंदर्य-प्रतियोगिता

गत दिवस डाकिया एक ख़त लेकर मेरे घर आया
बोला सौंदर्य-प्रतियोगिता में आपको जज है बनाया
सौंदर्य प्रतियोगिता में जाने का यह पहला मौका था
अभी तक सुंदरियों को हमने गली-मुहल्लों में देखा था
सो तय किया हम सौंदर्य-प्रतियोगिता में अवश्य जाएंगे
सर्वश्रेष्ठ सुंदरी को चुन "विश्व-सुंदरी" का ताज पहनाएंगे
जैसे ही हम पहुंचे हमारा हुआ बड़ा सत्कार
डाले गए गले में प्रेम से फूलों के हार
जैसे ही प्रतियोगिता आरंभ हुई
कुछ यौवनाएं "टू-पीस" पहने मंच पर निकलीं
दर्शकों सहित हमारी निगाहें भी उन पर फिसलीं
साथी सदस्यों ने दिखाए अपनी विद्वता के कमाल
किए उनसे कुछ आड़े-तेड़े सवाल
उस वक्त हमें आवेश बहुत है आया
मगर विवश हो हमने मन ही मन बुदबुदाया
क्या यही है सौंदर्य-प्रदर्शन?
होता है जहां अधनंगे जिस्मों का दर्शन
क्या इसी को कहते हैं सौंदर्य-प्रतियोगिता
जहां होती है मंच पर नग्न सभ्यता
यह सब देख हुई बड़ी निराशा
एक पल भी ना रूकने की मन में जागी अभिलाषा
किंतु बैठे रहे हम अपने मन को मार
करते रहे प्रतियोगिता के ख़त्म होने का इंतज़ार
कुछ समय बाद प्रतियोगिता हुई समाप्त
गई दर्शक-दीर्घा में भारी उत्सुकता व्याप्त
आयोजक ने हमें मंच पे था बुलाया
"सर्वश्रेष्ठ-सुंदरी" घोषित करें कुछ ऐसा फरमाया
तब हिम्मत करके हमने अपने मुंह को खोला
फिर सहमे-सहमे दिल से परिणामों को बोला
कहा-उपस्थित सज्जनों, आज यहां माहौल बड़ा रंगीन था
लेकिन सर्वश्रेष्ठ-सुंदरी को चुनना मामला ज़रा संगीन था
हुआ ही नहीं आज हमें यहां लज्जा का दर्शन
दिखाई दिया सिर्फ पाश्चात्य संस्क्रति का नग्न नर्तन
यूं देख तमाशा बेशर्मी का मन मेरा घबराए
लाख जतन करके भी हम नंबर दे ना पाए
कहते हुए हमें ये शर्म बड़ी आती है
आज की प्रतियोगिता निरस्त की जाती है
असली सौंदर्य देखना हो तो गांव हमारे आना
दिखाई देगा वहां सुंदरता का अनूठा बाना
सांझ ढले जब पनघट पर पनिहारिन पानी भरतीं हैं
भरी गगरिया सिर पे रख के लटक-मटक के चलतीं हैं
हाथों से जब पानी खींचे कंगना खन-खन करते हैं
मीठे-मीठे बोल गीत के सुर्ख़ लबों पर सजते हैं
इक लंबा सा घूंघट अपने मुख पर पहना होता है
हर गहने से बढ़कर यारों लाज का गहना होता है
देते हैं छूट खुली तुमको देखना चाहे जितना आंकलन कर
हमारी "ग्राम-सुंदरी" होगी हर विश्व-सुंदरी से बढ़कर।

कवि-हेमंत रिछारिया

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