गुरुवार, 23 फ़रवरी 2012

साहित्य का ग्रहण-काल

वर्तमान युग को यदि साहित्य का ग्रहण काल कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। आज हर क्षेत्र की भांति साहित्य भी राजनीति से अछूता नहीं रहा है या यूं जाए कि वर्तमान समय में राजनैतिक साहित्य का उद्भव एवं विकास हुआ है। जिन साहित्यकारों की राजनीति में पैठ है वे प्रतिष्ठित साहित्यकारों की श्रेणी में गिने जाते हैं और जिनमें आत्मप्रदर्शन की व्रत्ति नहीं है अर्थात जो राजनीतिक चाटुकारिता से दूर हैं वे हाशिए पर हैं। यही हाल समाचार-पत्रों और पत्रिकाओं का है। आज कमोबेश हर पत्रिका को अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए कहीं ना कहीं मानक सिद्धांतों से समझौता करना पड़ता है। कारण साफ़ है आज वही लिखा और प्रकाशित किया जाता है जो बाज़ार में बेचा जा सके यानि जिसकी मांग बाज़ार करता है। जो पत्रिका या साहित्यकार अपने सिद्धांतों से समझौता करने को राज़ी नहीं होता तो वह परिणामस्वरूप बाज़ार में औंधे मुंह गिरता है या फिर उसे अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए कबीर पंथी होना पड़ता है। आज साहित्य रसिकों में गिरावट होती जा रही है जिसका ख़ामियाज़ा उच्च कोटि के साहित्य को अपना अस्तित्व गंवा कर भुगतना पड़ रहा है। कहते हैं कि साहित्य समाज का दर्पन होता है तो क्या यह मान लिया जाए कि हमारा समाज कुरूप हो रहा है क्योंकि दर्पन में तो मात्र प्रतिछवि ही दिखाई देती है। यदि आज हमारा साहित्य निम्नस्तरीय होता जा रहा है तो इसके लिए साहित्यकारों से लेकर पाठकों तक सभी जिम्मेवार है।
-हेमंत रिछारिया

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