बुधवार, 1 फ़रवरी 2012

"हम अपनी माता व परिजनों से मिलना कबूल नहीं करेंगे।"-भगतसिंह


(शहीदे-आज़म भगतसिंह का जेलर को लिखे ख़त का सारांश)-
भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरू को फांसी की घोषणा हो चुकी थी। ये तीनों दीवाने अपील करके या क्षमा याचना करके अपने प्राण बचाना नहीं चाहते थे। इसी दौरान फांसी की तिथि नज़दीक आ गई। राजगुरू, सुखदेव और भगतसिंह के परिजन इन तीनों से अंतिम भेंट व दर्शन करने जेल परिसर पहुंचे। इन तीनों क्रांतिकारियों के दर्शन पाने एवं उनसे अंतिम भेंट करने की इच्छा से जेल परिसर में भारी भीड़ एकत्रित हो गई। यहां तक कि कानून व्यवस्था को खतरा पैदा हो गया। ऐसी स्थिति में अंग्रेज जेलर ने खबर भिजवाई की भीड़ को हम इन तीनों से नहीं मिलने देंगे, चाहें तो इनके परिजन व माताएं इनसे मिल सकतीं हैं।
जब जेल के अंदर भगतसिंह को यह ख़बर लगी तो उसने जेलर को एक चिट्ठी भिजवाई जिसमें लिखा था-"विदा की इस बेला में न कोई हमारा अपना है और न ही पराया। हम अपने घरवालों के लिए फांसी का फंदा चूमने को तैयार नहीं हुए हैं बल्कि देशवासियों के लिए यह रास्ता हमने जानबूझकर चुना है।
जब हमें अपने प्यारे देशवासियों से नहीं मिलने दिया जा रहा है तो हम अपनी माता व परिजनों से मिलना कबूल नहीं करेंगे।"

कोई टिप्पणी नहीं: