शनिवार, 4 फ़रवरी 2012

ढाई आखर प्रेम के


वेलेन्टाइन-डे का विरोध करना जैसे कुछ संगठनों एवं व्यक्तियों का कर्त्तव्य बन गया है। जब भी वेलेन्टाइन-डे आता है तब संगठन अपनी पिटी-पिटाई दलीलों के सहारे इसका विरोध करना शुरू कर देते हैं। ये तथाकथित समाज सुधारक इतना भी नहीं जानते कि क्रष्ण,मीरा,बुद्ध,महावीर,जीसस आदि सभी ने प्रेम को स्वीकार किया है। जीसस का प्रसिद्ध वचन है-प्रेम ही परमात्मा है। लेकिन इन संगठनों पता भी नहीं है कि आखिर ये विरोध किसका कर रहे हैं, प्रेम का या पाश्चात्य संस्क्रति का। यदि ये प्रेम का विरोध कर रहे हैं तो यह कुत्सित मानसिकता का परिचायक है और यदि पाश्चात्य संस्क्रति का तो ये सिर्फ़ अहंकार का पोषण मात्र है। प्रेम तो वो तत्व है;वो मार्ग है जो परमात्मा तक ले जाता है। रामक्रष्ण ने एक बार अपने शिष्य से कहा था कि यदि तुमने संसार में किसी से भी प्रेम किया हो तो मैं उसे परिशुद्ध कर तुम्हारा साक्षात्कार परमात्मा से करा सकता हूं लेकिन यदि तुमने संसार में किसी से भी प्रेम नहीं किया तो तुम्हें परमात्मा से मिला पाना कठिन है। समाज के ये तथाकथित ठेकेदार प्रेम की उसी संभावना को नष्ट करने पर तुले हुए हैं। इस तरह विरोध प्रदर्शन करने वाले इस बात से अनजान है कि जिस भावना को बलपूर्वक दबाया जाता है वह और भी बलवती होकर उभरती है। आज आवश्यकता प्रेम के विरोध की नहीं अपितु प्रेम के शुद्धिकरण की है। प्रेम का विरोध तो स्वंय परमात्मा का विरोध है। इसलिए ही संत कबीर ने कहा है-
"पोथी-पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ, पंडित भया ना कोय
ढाई अक्षर प्रेम के पढ़े सो पंडित होय।"

-हेमंत रिछारिया

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