शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2012

मजदूर


देखो ये मजदूर हैं,
हां-हां ये मजदूर हैं।
कठिनाईयों के साए में पले
सुखी जीवन से कई दूर हैं।
देखो ये मजदूर हैं....

राह पथरीली संकरा गलियारा
बाहों का ना कोई सहारा,
भरी दुपहरी है फिर भी
बोझा ढोने को मजबूर हैं।
देखो ये मजदूर हैं....

घास फूस से बने घरों में
जब जीवन सिसकी लेता है,
आंखों से झरता पानी
सारा अन्त: भर देता है,
अपने हाथों से अंखियां पोंछें
आंचल हुए अपनों के दूर हैं।
देखो ये मजदूर हैं....

अरमां इनके सीने में दफन हैं
सारे सुख मेहनत की रहन हैं,
आंखों के सारे सपने इनकी
आंखों में ही चूर हैं।
देखो ये मजदूर हैं....

माथे पे पसीना है इनके
नैनों में उदासी छाई है,
किससे पूछें;कौन बताए
खोई कहां तरूणाई है,
बेरंग हुई है रंगत
हुए चेहरे बेनूर हैं।
देखो ये मजदूर हैं....

कवि-हेमंत रिछारिया

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