गुरुवार, 2 फ़रवरी 2012

"......कि नथूराम निर्दोष है!"

न्यायमूर्ति जस्टिस खोसला(नथूराम गोडसे को फांसी की सज़ा देने वाली बेंच के सदस्य जज) ने गांधी-वध के लगभग १५ वर्ष पश्चात अपनी सेवानिव्रत्ति के बाद दस न्याय-निर्णय कथाओं का एक ग्रंथ लिखा। उसमें गांधी-वध (The Murder of the Mahatma) अर्थात नथूराम गोडसे का अभियोग का भी एक अध्याय है। श्री खोसला के मन पर उस समय जो मुद्रा अंकित हुई थी वह उन्होने कुछ इस प्रकार शब्दांकित की है। वे लिखते हैं-"नथूराम का वक्तव्य न्यायालय में उपस्थित दर्शकगणों के लिए एक आकर्षक वस्तु थी। खचाखच भरा न्यायालय इतना भावाकुल हुआ था कि उनकी आहें और सिसकियां सुनने में आतीं थीं और उनके गीले-गीले नेत्र और गिरने वाले आंसू दिखाई देते थे। न्यायालय मे उपस्थित उन प्रेक्षकों को यदि न्यायदान का कार्य सौंपा जाता तो मुझे तनिक भी संदेह नहीं है कि उन्होंने अधिक से अधिक संख्या में यह कहा होता कि नथूराम निर्दोष है।

("I have however no dought that had the audiance of that day been constituted into a Jury and entrusted with the task of deciding Godse's appeal, they would have brought in a verdict of 'not guilty' by an overwhelming majority")

JUSTICE KHOSLA
-The Murder of The Mahatma,Page 234

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