बुधवार, 1 फ़रवरी 2012

पिताजी: पारिवारिक परिवेश में

पिताजी के जीवन को मैंने उत्थान व पतन की इस प्रक्रिया के विपरीत पाया। जब उनके द्वारा भगतसिंह महाकाव्य की रचना की जा रही थी तब उन्होंने स्वंय को एक इंकलाबी की तरह रखा। पूरे लेखन-काल में वे जमीन पर एक दरी बिछा कर और एक पतला सा चादर ओढ़कर रातें बिताते थे। लेखन कार्य के दौरान दो रूखी रोटी तथा दाल लेते थे। कभी-कभी उबली हुई सब्जी में नमक डालकर खा लेते थे। पांच-छ: किलोमीटर की यात्रा वे पैदल ही करते थे। येन-केन-प्रकारेण लेखन कार्य पूरा हुआ। अब समस्या प्रकाशन की थी। घर के ड्राइंग-रूम की वस्तुएं तो पहले ही बिक चुकी थीं अब बिकने की बारी मां के ज़ेवरों की थी। जो आभूषण शादी के समय हमारी मां पर चढ़े थे वे आभूषण अब "भगतसिंह" पर चढ़ने की तैयारी करने लगे। प्रकाशन उपरांत "महाकाव्य" हाथ में आया। पर चूंकि वह एक देशभक्त क्रांतिकारी पर लिखा गया था सो सड़कों पर बिकना उसकी नियति थी। भीषण गर्मी में पिताजी ने पुस्तकें ठेले पर लादीं और उन्हें बेचने का सिलसिला शुरू हुआ।
चिलचिलाती धूप से पिघली हुई सड़कों पर ठेले के पहियों की उन लकीरों को देखकर कोई भी ज्योतिषी "भगतसिंह महाकाव्य" और उसके लेखक का भविष्य आसानी से बता सकता था। यही वह समय था जब "श्रीक्रष्ण सरल" के नाम से जाने जानेवाले इस शख़्स को एक इंकलाबी पर कलम चलाने के जुर्म में कई बार अपनी पत्नी और बच्चों सहित भूखा रहना पड़ा।
मैं सबेरे स्कूल जाकर दोपहर के प्रारंभ तक घर लौटता था। इस समय तक बड़े भाई साहब तैयार होकर स्कूल जाते थे। दरअसल वे मेरा नहीं, उन चप्पलों का इंतज़ार करते थे जिन्हें पहनकर मैं स्कूल जाता था। चूंकि उस समय हम दोनों भाईयों के बीच मात्र एक जोड़ा चप्पल ही हुआ करती थी। चप्पलों के आदान-प्रदान की इस प्रक्रिया को पिताजी बड़ी संजीदगी से देखते थे। किसी देश के नागरिकों को यदि उस देश पर मिटने वाले जांबाजों की गाथाओं से ही अपरिचित रखा जाएगा तो वह गर्व किस पर करेंगे? उनमें अपने वतन के प्रति प्यार कैसे पैदा होगा? वे अपने देश की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति कैसे देंगे?
अनेक आर्थिक व सामाजिक विषमताओं के बावजूद पिताजी ने अपना लेखकीय कर्त्तव्य निभाया है। किसी को हो ना हो, हमारे परिवार के प्रत्येक सदस्य को उन पर गर्व है।
-धर्मेंद्र सरल
(सरलजी के सुपुत्र)

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