बुधवार, 1 फ़रवरी 2012

लार्ड मैकाले का भाषण

२ फरवरी १८३५ को ब्रिटिश संसद में दिया लार्ड मैकाले का भाषण)-
"मैंने भारत की ओर-छोर की यात्रा की है पर मैंने एक भी आदमी ऐसा नहीं देखा जो भीख मांगता हो या चोर हो। मैंने इस मुल्क में अपार संपदा देखी है। उच्च उदात्त मूल्यों को देखा है। इन योग्यता मूल्यों वाले भारतीयों को कोई कभी जीत नहीं सकता यह मैं मानता हूं, तब तक; जब तक कि हम इस मुल्क की रीढ़ ही ना तोड़ दें, और भारत की रीढ़ है उसकी आध्यात्मिक और सांस्क्रतिक विरासत।
इसलिए मैं यह प्रस्ताव करता हूं कि भारत की पुरानी शिक्षा व्यवस्था को हम बदल दें। उसकी संस्क्रति को बदलें ताकि हर भारतीय यह सोचे कि जो भी विदेशी है, वह बेहतर है। वे यह सोचने लगें कि अंग्रेजी भाषा महान है अन्य देशी भाषाओं से। इससे वे अपना सम्मान खो बैठेंगे। अपनी देशज जातीय परंपराओं को भूलने लगेंगे और फिर वे वैसे ही हो जाएंगे जैसा हम चाहते हैं, सचमुच एक आक्रांत एवं पराजित राष्ट्र।
-लार्ड मैकाले

1 टिप्पणी:

Arun Dixit ने कहा…

जो लोग भारतीय समाज पर पिछडेपन और मूल्‍यहीन होने का आरोप लगाते हैं और जिनके लिए पश्‍चिमी शिक्षा और मूल्‍य ही सब कुछ हैं उन्‍हें इस भाषण पर ध्‍यान देना चाहिये। लार्ड मैकाले वास्‍तव में अत्‍यन्‍त प्रबुद्ध और राष्‍ट्रभक्‍त व्‍यक्ति था लेकिन सिर्फ अपने देश के लिये। भारतीयों को तो वह गुलाम बनाने आया था और अपनी सारी प्रतिभा उसने अपने इस मिशन में लगा दी। हमें उससे राष्‍ट1भक्ति का सबक तो लेना ही चाहिये।