शुक्रवार, 22 जुलाई 2011

बरखा रानी



कैसे करूं मैं स्वागत तेरा,
बता ओ बरखा रानी।
घर की छ्त गलती अक्सर,
जब-जब बरसे पानी॥

बारिश में लगता हर सूं मौसम बड़ा सुहाना,
बूंद-बूंद इक ताल सुनाए पंछी गाएं गाना।
मैं सोचूं कैसे चूल्हे की आग जलानी॥
कैसे करूं मैं स्वागत तेरा....


ठंडी-ठंडी बौछारें हैं पवन चले घनघोर,
बादल गरजे उमड़-घुमड़ नाचे वन में मोर।
मन मेरा सोचे कैसे गिरती दीवार बचानी॥
कैसे करूं मैं स्वागत तेरा....


इंद्रधनुष की छ्टा बिखेरी बरसा पानी जम के,
पांवों में नूपुरों को बांधे बरखा नाची छ्म से।
मैं ढूंढूं वो सूखा कोना जहां पे खाट बिछानी॥
कैसे करूं मैं स्वागत तेरा....


पृकृति कर रही स्वागत तेरा कर अपना श्रृंगार,
पपीहे ने किया अभिनंदन गा कर मेघ मल्हार।
मैं करता स्वागत तेरा भर अंखियों में पानी,
आ जा ओ बरखा रानी, आ जा ओ बरखा रानी॥

-हेमंत रिछारिया

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