शुक्रवार, 8 जनवरी 2010

आजादी का गाना


मन कहता है लिखो आज तुम आजादी का गाना
मात्रभूमि के दीवानों का गाओ एक तराना ॥

एक समय था पारतंत्र्य के लगे हुए थे बन्ध
प्राणों पर पहरा लगता था, वाणी पर प्रतिबन्ध।
भाई की गर्दन, भाई की असि ही चूम रही थी,
देश-द्रोहियों के चरणों पर लक्ष्मी झूम रही थी।
शिक्षा; दीक्षा और परीक्षा, सब पर अनुशासन था,
जहां फिरंगी हमें बिठाएं, वह ही निज आसन था।
प्रथ्वी;वायु;गगन पर केवल उनका था अधिकार,
जो वे कहते, मन मसोस कर करते हम स्वीकार।
किन्तु देश के कुछ वीरों ने इसको सत्य न माना।
मन कहता है लिखो आज तुम आजादी का गाना॥


//१//


उर स्पंदित हुआ, बुद्धि में व्याकुलता छाई।
स्वतंत्रता के महायग्य-हित नव-चेतना आई॥
जिसके मुख को स्वाद लगा हो, रक्त सदा पीने का।
वह कब शीघ्र स्वत्व देता है मानव को जीने का॥
अत्याचारों की परंपरा ने ले ली अंगड़ाई।
हाथों में हथकड़ी पैर में बेड़ी गई पहनाई॥
देशभक्त की अंतरात्मा इस में भी मुस्काई।
बेड़ी की झन-झन में उसको वीणा पड़ी सुनाई॥
तप:पूत ऐसे जीवन को मस्तक सदा झुकाना।
मन कहता है लिखो आज तुम आजादी का गाना॥


//३//


यह आजादी पूज्य तिलक की वाणी से आई है।
यह आजादी भगतसिंह की फांसी ला पाई है॥
इस आजादी ने मांगे हैं बड़े-बड़े प्रतिदान।
बिस्मिल,शेखर और बोस का वह महान बलिदान॥
यह आजादी गांधीजी का सत्याग्रह लाया है।
मालवीय की नैष्ठिक चर्या से इसको पाया है॥
आजादी का दुर्ग बन गया ध्वज फहरा अपना है।
जिनके तन-मन प्राण रक्त से इतना भव्य बना है॥
देशवादियों! उनके प्रति ही मत क्रतघ्न बन जाना।
मन कहता है लिखो आज तुम आजादी का गाना॥


-प.पू. स्वामी सत्यमित्रानन्द जी

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