मंगलवार, 5 जनवरी 2010

आओ मन गांठे खोलें

यमुना तट, टीले रेतीले
घास फूस का घर डंडे पर
गोबर से लीपे आंगन में,
तुलसी का बिरवा; घंटी स्वर,
मां के मुंह से दोहे चौपाई रस घोलें,
आओं मन की गांठें खोलें!!

बाबा की बैठक में बिछी
चटाई बाहर रखें खड़ाऊं
मिलने वाले के मन में
असमंजस; जाऊं कि ना जाऊं?
माथे तिलक; आंख पर ऐनक; पोथी खुली स्वयं से बोले,
आओ मन की गांठे खोलें!!

सरस्वती की देख साधना
लक्ष्मी ने संबंध न जोड़ा
मिट्टी ने माथे का चंदन
बनने का संकल्प न छोड़ा
नये वर्ष की अगुवानी में
टुक रुक लें, कुछ ताजा हो लें!
आओ मन की गांठे खोलें !!

-श्री अटल बिहारी वाजपेयी
(भूतपूर्व प्रधानमंत्री)

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