शुक्रवार, 8 जनवरी 2010

दे दान, दे बलिदान!



चाहिए क्या तुम्हें,
हंसते-महकते गुलाबों की सुगन्ध?
तो राह कांटो की करो स्वीकार।
देखना है क्या तुम्हें,
प्रात: के सूर्य बिम्ब की हंसती सौंदर्य-राशि?
तो दूर भगाओ मध्यरात्रि से स्याह-काले क्षण।
चाहिए क्या तुम्हें,
स्वर्गानन्द स्वतंत्रता का;
और मधुर फल मुक्ति का?
तो फिर अदा करो उसकी कीमत,
आजादी को चाहिए
दु:ख; वेदना और बलिदान!
दे दान, दे बलिदान !!
- सुभाषचंद्र बोस

(महानायक, प्र.क्र.२२४)

कोई टिप्पणी नहीं: