शुक्रवार, 8 जनवरी 2010

पुष्प की अभिलाषा


चाह नहीं मैं सुरबाला के गहनों में गूंथा जाऊं,
चाह नहीं प्रेमी माला में बिंध प्यारी को ललचाऊं,
चाह नहीं सम्राटों के शव पर हे हरि डाला जाऊं,
चाह नहीं देवों के सिर पर चढूं भाग्य पर इतराऊं,



मुझे तोड़ लेना वनमाली,
उस पथ पर देना तुम फेंक !
मात्रभूमि पर शीश चढ़ाने,
जिस पथ जावें वीर अनेक !!

-स्व.माखनलाल चतुर्वेदी

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