शुक्रवार, 8 जनवरी 2010

दे दान, दे बलिदान!



चाहिए क्या तुम्हें,
हंसते-महकते गुलाबों की सुगन्ध?
तो राह कांटो की करो स्वीकार।
देखना है क्या तुम्हें,
प्रात: के सूर्य बिम्ब की हंसती सौंदर्य-राशि?
तो दूर भगाओ मध्यरात्रि से स्याह-काले क्षण।
चाहिए क्या तुम्हें,
स्वर्गानन्द स्वतंत्रता का;
और मधुर फल मुक्ति का?
तो फिर अदा करो उसकी कीमत,
आजादी को चाहिए
दु:ख; वेदना और बलिदान!
दे दान, दे बलिदान !!
- सुभाषचंद्र बोस

(महानायक, प्र.क्र.२२४)

मेरे सपनों का भारत





" हमें चाहिए एक शक्ति-संपन्न संघराज्य, जहां किसानों और मजदूरों की हिमायत करने वाली जागरूक सरकार हो।
रूस की तरह पंचवार्षिक नियोजन हो, देश में आधारभूत उद्योगों और औद्योगीकरण की बुनियाद डाली जाय, ग्रामोद्योगों को भी
प्रोत्साहन मिले, जनसंख्या व्रद्धि पर समयोचित अंकुश लगाया जाय, जात-पात का भेदभाव समाप्त हो, विभिन्न भाषा-भाषियों में अपनत्व बढ़े। अपनी ही माटी की गंध से रचा-बना हम एक ऐसा नया साम्यवाद ले आएं जो प्राचीन काल की ही भांति आधुनिक काल में भी विश्व का नेत्रत्व करे।"

-नेताजी सुभाषचंद्र बोस
(महानायक, प्र.क्र.२२७)

आजादी का गाना


मन कहता है लिखो आज तुम आजादी का गाना
मात्रभूमि के दीवानों का गाओ एक तराना ॥

एक समय था पारतंत्र्य के लगे हुए थे बन्ध
प्राणों पर पहरा लगता था, वाणी पर प्रतिबन्ध।
भाई की गर्दन, भाई की असि ही चूम रही थी,
देश-द्रोहियों के चरणों पर लक्ष्मी झूम रही थी।
शिक्षा; दीक्षा और परीक्षा, सब पर अनुशासन था,
जहां फिरंगी हमें बिठाएं, वह ही निज आसन था।
प्रथ्वी;वायु;गगन पर केवल उनका था अधिकार,
जो वे कहते, मन मसोस कर करते हम स्वीकार।
किन्तु देश के कुछ वीरों ने इसको सत्य न माना।
मन कहता है लिखो आज तुम आजादी का गाना॥


//१//


उर स्पंदित हुआ, बुद्धि में व्याकुलता छाई।
स्वतंत्रता के महायग्य-हित नव-चेतना आई॥
जिसके मुख को स्वाद लगा हो, रक्त सदा पीने का।
वह कब शीघ्र स्वत्व देता है मानव को जीने का॥
अत्याचारों की परंपरा ने ले ली अंगड़ाई।
हाथों में हथकड़ी पैर में बेड़ी गई पहनाई॥
देशभक्त की अंतरात्मा इस में भी मुस्काई।
बेड़ी की झन-झन में उसको वीणा पड़ी सुनाई॥
तप:पूत ऐसे जीवन को मस्तक सदा झुकाना।
मन कहता है लिखो आज तुम आजादी का गाना॥


//३//


यह आजादी पूज्य तिलक की वाणी से आई है।
यह आजादी भगतसिंह की फांसी ला पाई है॥
इस आजादी ने मांगे हैं बड़े-बड़े प्रतिदान।
बिस्मिल,शेखर और बोस का वह महान बलिदान॥
यह आजादी गांधीजी का सत्याग्रह लाया है।
मालवीय की नैष्ठिक चर्या से इसको पाया है॥
आजादी का दुर्ग बन गया ध्वज फहरा अपना है।
जिनके तन-मन प्राण रक्त से इतना भव्य बना है॥
देशवादियों! उनके प्रति ही मत क्रतघ्न बन जाना।
मन कहता है लिखो आज तुम आजादी का गाना॥


-प.पू. स्वामी सत्यमित्रानन्द जी

पुष्प की अभिलाषा


चाह नहीं मैं सुरबाला के गहनों में गूंथा जाऊं,
चाह नहीं प्रेमी माला में बिंध प्यारी को ललचाऊं,
चाह नहीं सम्राटों के शव पर हे हरि डाला जाऊं,
चाह नहीं देवों के सिर पर चढूं भाग्य पर इतराऊं,



मुझे तोड़ लेना वनमाली,
उस पथ पर देना तुम फेंक !
मात्रभूमि पर शीश चढ़ाने,
जिस पथ जावें वीर अनेक !!

-स्व.माखनलाल चतुर्वेदी

बुधवार, 6 जनवरी 2010

"आपको अधिकार न था"


शहीदे-आज़म भगत सिंह का पत्र

(३० सित. १९३० को भगतसिंह के पिता सरदार किशनसिंह ने ट्रिब्यूनल को एक अर्जी देकर बचाव पेश करने के लिए अवसर की मांग की। उससे आहत होकर भगतसिंह ने ४ अक्टूबर १९३० को अपने पिता को यह पत्र लिखा)

पूज्य पिता जी,

मुझे यह जानकर हैरानी हुई है कि आपने मेरे बचाव-पक्ष के लिए स्पेशल ट्रिब्यूनल को आवेदन भेजा है। यह खबर इतनी यातनामय थी कि मैं इसे खामोशी से बर्दाश्त नहीं कर सका। इस खबर ने मेरे भीतर की शांति भंग कर उथल-पुथल मचा दी है। मैं यह नहीं समझ सकता कि वर्तमान स्थितियॊं में और इस मामले पर आप किस तरह का आवेदन दे सकते हैं? आपका पुत्र होने के नाते मैं आपकी पैत्रक भावनाओं और इच्छाओं का पूरा सम्मान करता हूं। लेकिन इसके बावजूद मैं समझता हूं कि आपको मेरे साथ सलाह-मशविरा किये बिना ऐसे आवेदन देने का कोई अधिकार नहीं था।
पिता जी, मैं बहुत दु:ख का अनुभव कर रहा हूं। मुझे भय है आप पर दोषारोपण करते हुए या इससे बढ़कर आपके इस काम की निंदा करते हुए मैं कहीं सभ्यता की सीमाएं न लांघ जाऊं और मेरे शब्द ज़्यादा सख़्त न हों जाएं। लेकिन मैं स्पष्ट शब्दों में अपनी बात अवश्य कहूंगा। यदि कोई अन्य व्यक्ति मुझसे ऐसा व्यवहार करता तो मैं इसे गद्दारी से कम न मानता, लेकिन आपके संदर्भ में मैं इतना ही कहूंगा कि यह एक कमजोरी है; निचले स्तर की कमजोरी।

आपका
भगतसिंह

मंगलवार, 5 जनवरी 2010

आओ मन गांठे खोलें

यमुना तट, टीले रेतीले
घास फूस का घर डंडे पर
गोबर से लीपे आंगन में,
तुलसी का बिरवा; घंटी स्वर,
मां के मुंह से दोहे चौपाई रस घोलें,
आओं मन की गांठें खोलें!!

बाबा की बैठक में बिछी
चटाई बाहर रखें खड़ाऊं
मिलने वाले के मन में
असमंजस; जाऊं कि ना जाऊं?
माथे तिलक; आंख पर ऐनक; पोथी खुली स्वयं से बोले,
आओ मन की गांठे खोलें!!

सरस्वती की देख साधना
लक्ष्मी ने संबंध न जोड़ा
मिट्टी ने माथे का चंदन
बनने का संकल्प न छोड़ा
नये वर्ष की अगुवानी में
टुक रुक लें, कुछ ताजा हो लें!
आओ मन की गांठे खोलें !!

-श्री अटल बिहारी वाजपेयी
(भूतपूर्व प्रधानमंत्री)

ग़ज़ल

जिंदगी को मुहब्बत से निखारा जाए
इस हवेली को ज़रा और संवारा जाए।

माना, मुश्किल है बड़ा जीतना इसको लेकिन
खेल जीवन का भला किसलिए हारा जाए।

कोई तो होती है दु:ख सहने की हद ए यारो
कब तलक जीस्त में ये ज़हर उतारा जाए।

रोज़ ही पड़ती है कुछ गर्द जहां की इन पर
रोज़ ही क्यों न दिल-ओ-जां को बुहारा जाए।

पहली बौछार है सावन की उमंगों से भरी
जी में आता है कि साजन को पुकार जाए।

सच ही कहते हो कि उम्मीद पे जग जीता है
घर को ए "प्राण" चलों यूं ही उबारा जाए।
-प्राण

शुक्रवार, 1 जनवरी 2010

नववर्ष मंगलमय हो


सरल-चेतना के सभी पाठकों को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं
-संपादक

प्रार्थना


ज्योति जला निज प्राण की

ज्योति जला निज प्राण की, बाती गढ़ बलिदान की
आओ हम सब चलें उतारें, मां की पावन आरती
यह वसुंधरा मां जिसकी, गोद में हमने जन्म लिया।
खाकर जिसका अन्न-अमरत सम, निर्मल शीतल नीर पिया॥
श्वासें भरीं समीर में, जिसका रक्त शरीर में।
आज उसी की व्याकुल होकर, ममता हमें पुकारती॥

//२//

जिसका मणिमय मुकुट सजाती, स्वर्णमयी कंचन जंघा।
जिसके वक्षस्थल से बहती, पावनतम यमुना-गंगा॥
संध्या रचे महावरी, गाये गीत विभावरी।
अरूण करों से ऊषा सलोनी, जिसकी मांग संवारती॥

//३//

जिस धरती के अभिनंदन को, कोटि-कोटि जन साथ बढे़।
जिसके चरणों के वंदन को, कोटि-कोटि तन-माथ चढ़े॥
लजा न जिसके क्षीर को, त्रण-सा तजा शरीर को।
अमर शहीदों की यशगाथा, जिसका स्नेह दुलारती॥

//४//

देखो इसीं धरा जननी पर, संकट के घन छाये हैं।
घनीभूत होकर सीमाओं पर, फिर से घिर आये हैं॥
शपथ तुम्हें अनुराग की, लुटते हुए सुहाग की।
पल भर की देरी न तनिक, माता खड़ी निहारती॥
चलें उतारें आरती, मां की पावन आरती...
******