शनिवार, 2 अक्तूबर 2010

फैसले ने खींचा नकाब


३० सितंबर को राम जन्मभूमि विवाद पर आए उच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले ने जहां सांप्रदायिक सौहाद्र;राष्ट्रीय एकता और उदारवादिता की कलई खोल दी वहीं कई राजनेताओं के चेहरों को बेनकाब कर दिया। उच्चतम न्यायालय में फैसला सुनाए जाने के पक्ष में दोनों पक्षकरों की ओर से यह दलील दी गई थी कि देश की जनता अब परिपक्व हो चुकी है इसलिए ६० वर्षों से लंबित इस विवाद पर फैसला सुना दिया जाना चाहिए। परंतु मैं यदि उच्चतम न्यायालय में वकील के रूप में उपस्थित होता तो निवेदन करता कि इस फैसले को स्थगित रखा जाए क्योंकि देश की जनता भले ही परिपक्व हो चुकी है परंतु देश की राजनीति और राजनेता अभी तक अपरिपक्व हैं। फैसले से पूर्व एक न्यूज़ चैनल पर अमन की दुहाई देने वाले ५ लाख मस्ज़िदों के इमामों के रहनुमा ने चंद घंटो बाद ही उच्च न्यायालय के फैसले पर नाखुशी ज़ाहिर करते हुए उच्चतम न्यायालय जाने की बात कह दी। कैसे ज़फरयाब जिलानी साहब जो बा-आवाज़े-बुलंद फैसले के सम्मान की पैरवी करते थे फैसले के बाद यह कहते नज़र आए कि " फैसला हमारी उम्मीद के मुताबिक नहीं आया। हम उच्चतम न्यायालय में इसे चुनौती देंगे।" वहीं अपने नाम के ठीक उलट एक राजनेता ने अपने कठोर वक्तव्य में यह तक कह दिया कि मुस्लिम संप्रदाय ठगा गया है। इन्हीं राजनेता के वफादार साथी;जो अब इनकी बेवफा़ई के किस्से मीडिया में बडे़ ही तल्ख़ सुरों में बयान करते हैं; वे भी इस मसले पर इनके सुर में सुर मिलाते नज़र आए। बहरहाल, मैं फैसले पर किसी भी प्रकार की टिप्पणी करने का अपने आपको अधिकारी नहीं पाता हूं परंतु इस देश का नागरिक होने के नाते अपनी एक राय अवश्य रखता हूं जो यह है कि यह फैसला सांप्रदायिक सौहाद्र और राष्ट्रीय एकता की दिशा में बड़ा ही सार्थक कदम है। इस फैसले से जहां एक ओर सुलह और समझौते के स्पष्ट संकेत मिलते हैं वहीं धर्म और जात-पात की कुरीतियों पर भी यह कुठाराघात करता है। फैसले से साफ स्प्ष्ट है कि किस पक्ष को उदारवादिता दिखाना चाहिए और किस पक्ष को उस उदारवादिता को अपनी जीत ना मानकर संयम से दूसरे पक्ष का आभार मानना चाहिए। एक आम नागरिक होने के नाते मैं इस फैसले से संतुष्ट हूं और इस फैसले का सम्मान करता हूं। कमोबेश यही भावना आज हर एक देशवासी की है। परंतु फिर भी वोट बैंक की राजनीति करने वाले अपने घ्रणित इरादों में कामयाबी के लिए इसे भी अपनी नापाक राजनीति का हिस्सा बनाकर ही दम लेंगे। क्या ये मुमकिन नहीं कि अयोध्या में एक भव्य राममंदिर का निर्माण हो जिसमें नींव का पत्थर हमारे मुस्लिम भाइयों के हाथों से रखा जाए। बेशक मुमकिन है जब मुस्लिम कवि रसखान भगवान क्रष्ण के गोकुल की गाय बनने कि चाहत रखते हों तो यह क्यों नहीं हो सकता। आज भी हमारे शहर नर्मदापुरम (होशंगाबाद) में रामजी बाबा और मुहम्मद शाह गौरी की दोस्ती की अमर परंपरा मौजूद है जहां रामजी बाबा मेले की शुरूआत बाबा की समाधिस्थल की चादर के मुहम्मद शाह गौरी की दरगाह पर चढाए जाने और दरगाह से लाए झंडे (निशान) के मंदिर पर चढाए जाने के बाद होती है। ऐसी एक नहीं हज़ारों नज़ीरें हैं । परंतु यह तभी संभव है जब हम किसी सियासी बहकावे में ना आकर अपनी आने वाली पीढियों के बारे में विचार करें। उन्हे एक स्वस्थ अतीत और प्रेमपूर्ण परंपरा प्रदान करने की दिशा में अपने कदम बढाएं। आज यह सब एक ख़्वाब सा प्रतीत होता है पर रामलला से मेरी यही प्रार्थना है कि एक बार यह ख़्वाब सच हो जाए। किसी शायर ने क्या खूब कहा है-
" क्या क्या बनाने आए थे;क्या क्या बना बैठे
कहीं मंदिर तो कहीं मस्ज़िद बना बैठे,
हम से अच्छी तो परिन्दों की ज़ात है
कभी मंदिर पे जा बैठे;कभी मस्ज़िद पे जा बैठे|"
- हेमन्त रिछारिया

मंगलवार, 9 मार्च 2010

मेरे दोहे अनुभूति पर


निकले थे घर से कभी, हम सपनों के साथ
इक-इक करके राह में, सबने छोडा हाथ

प्यारी दैरो-हरम से,तेरी ये दहलीज़
मैंने तेरे नाम का, डाल लिया ताबीज़

रखने की गुलदान में, मत करना तुम भूल
नहीं महक सकते कभी, कागज़ के ये फूल

अब ये देखें बीच में, कौन हमारे आय
हम तो बैठे हैं यार, तुझको खुदा बनाय

रोके से रुकता नहीं, करता मन की बात
हम लाचार खड़े रहें, मन की ऐसी जात

कल मुझसे टकरा गई, इक नखराली नार
अधर पांखुरी फूल की, चितवन तेज कटार

तुमने छेड़ा प्यार का, ऐसा राग हुज़ूर
सदियों तक बजता रहा, दिल का ये संतूर

देखो ये संसार है, या कि भरा बाज़ार
संबंधों के नाम पर, सभी करें व्यापार

दुई रोटी के वास्ते, छोड़ दिया जब गांव
भरी दुपहरी यार क्यूं, ढूंढ रहे हो छांव

लौट बराती सब चले, अपने-अपने गांव
रुके रहे देहरी पर, रोली वाले पांव

तुमने अपने प्रेम का, डाला रंग;अबीर
घर बारै मैं आपना, होता गया कबीर

सच से होगा सामना, तो होगा परिवाद
बेहतर है कि छोड़ दो, सपनों से संवाद

-हेमंत रिछारिया

सोमवार, 8 मार्च 2010

फिल्म समीक्षा-"पा"


कल सुबह जब देश-दुनिया का हाल जानने के लिये जब अख़बार पर नज़र डाली तो निगाहें बरबस ही एक विग्यापन पर अटक गई। विग्यापन था फिल्म "पा" के बारे में जो शाम ५:३० बजे स्टार-प्लस पर प्रदर्शित होने वाली थी। यदा-कदा ही इस फिल्म के प्रोमो देखकर इतना तो यकीं हो ही गया था कि "पा" एक देखने लायक फिल्म है। पर जब शाम ५:३० बजे चाय की चुस्कियों के बीच जब यह फिल्म देखी तो मन आर.बाल्की; जो इस फिल्म के लेखक और निर्देशक हैं और अभिनय सम्राट अमिताभ बच्चन के प्रति नतमस्तक हो गया। दोनों ने अपने-अपने क्षेत्र में बहुत ही उम्दा काम किया है। गहन संवेदनाओं; संदेशों और भरपूर मनोरंजन से लबरेज़ "पा" नि:संदेह ही सिने जगत की महानतम फिल्मों में से है। जहां तक अमित जी का सवाल है तो उम्र के इस पड़ाव पर १३ साल के बीमार बच्चे का जीवंत अभिनय कर पाना यदि किसी की सामर्थ्य में है तो बस इस महानायक के। भारतीय सिनेमा जगत में सैकड़ों निर्माता-निर्देशक है पर लीक से हटकर स्वस्थ और संदेशात्मक तस्वीर बनाने वाले उंगलियों पर गिने जा सकते हैं। यहां मैं याद करना चाहूंगा फिल्म "ब्लैक" के निर्देशक संजयलीला भंसाली को, और "तारे ज़मीन पर" के लिये आमिर खान को इस प्रकार की फिल्में भारतीय सिने जगत को एक विशिष्टता प्रदान करतीं हैं। कुछ ही निर्माता निर्देशक ऐसे हैं जो व्यवसाय के आधार पर फिल्में ना बनाकर सामाजिक सुधार और सकारात्मक परिवर्तन के लिये फिल्में बनाते हैं। यहां यदि दि-ग्रेट शो मैन राजकपूर साहब को याद नहीं किया जाये तो यह अन्याय होगा। "प्रेम-रोग" जैसी फिल्म के जरिये उन्होने विधवा विवाह का जो संदेश दिया उसे भला कौन भूल सकता है। एक समय था जब ऐसी फिल्में बाक्स-आफिस पर औंधे मुंह गिरा करतीं थी परिणामस्वरूप भविष्य में कोई निर्माता-निर्देशक कबीर की जमात में शामिल होने की हिम्मत नहीं करता था। पर अच्छी बात है कि अब समय बदल रहा है अब ऐसी फिल्मों को दर्शक भी मिल रहे हैं और सम्मान भी लिहाज़ा अब कई निर्माता-निर्देशक इस ओर अपना ध्यान दें रहे हैं। आज समाज को स्वस्थ व अच्छे मनोरंजन की आवश्यकता है। जो उनके विकास में सहभागी हो सके, उनका मार्गदर्शन कर सके। "पा" इसी क्रम की एक बेहतरीन फिल्म है। इसके लिये मैं एक बार पुन: आर.बाल्की और अमिताभ बच्चन जी का ह्रदय से आभारी हूं, और उम्मीद करता हूं कि जल्द ही हमें ऐसी एक और फिल्म देखने को मिलेगी।

-हेमंत रिछारिया

सोमवार, 1 मार्च 2010

ऐसे खेलें फाग


आओ सखि हम तुम मिल खेलें, ऐसे अबके फाग
धो लें सारे द्वेष ह्रदय के, धो लें सारे राग।

लाज का अवगुंठन मुख पर, धरोगे आखिर कब तक
पांव तुम्हारे भी थिरकेंगे, जब छिड़ेंगे मेरे राग।

लाख करो मनुहार भले, बैंया ना छोडूंगा
व्यर्थ बहाने करके तुम, जाती हो जी भाग।

रंगो की बौछार चहुंदिस, अंबर पे लाली छाई
बूंदो का ले रूप झर रहा, नित नूतन अनुराग।

तेरे मेरे अधर मिलें, तो लगता ऐसे
चूम कली को ले उड़ जाए, जैसे भंवर पराग।

यौवन जब रंग में भीगे, कोई कैसे मन समझाए
उलझी अलकें; तिरछी पलकें, आग लगे है आग।

दिनकर चढ़ा मुंडेर, द्वार खड़े हुरियारे
कहे मैया ओ मूढ़मति, अब तो सपनों से जाग।

-हेमन्त रिछारिया

रविवार, 28 फ़रवरी 2010

कविता

नेह ने देह में सेंध दई
अंखियान को रंग अबीरी भयो,
तन तो तन है मन की का कहैं
असरीरी हू थो सो सरीरी भयो,
गहि गैल में चूम लियो नंदलाल ने
हाय वह वहरीरी भयो,
सब चाखन कूं लालच फिरें
जैसे गोरी को गाल पंजीरी भयो।
-आत्मप्रकाश शुक्ल

होली के दोहे

दहकी दहकी दोपहर बहकी-बहकी रात।
फागुन आया गांव में लेकर ये सौगात॥

है चंदन के लेप सी ये सीने की आंच।
सखि पाती बिन बैन के नैन मूंदकर बांच॥

खनक उठे हैं लाज के बागी बाजूबंद।
संयम के हर छंद को होने दो स्वछंद॥
-शिवओम अम्बर

बरस नया ले आ गया, रंगो का त्यौहार।
चटक-मटक गोरी फिरे, पिय करे मनुहार॥

केशर से रंगी बदन, कस्तूरी सी रात।
पायल बिछ्वे कर रहे, चुपके-चुपके बात॥

यह यायावर ज़िंदगी, चलते-चलते पांव।
भर पिचकारी मार दे, आए तेरे गांव॥

दहक रहा टेसू खड़ा, घूंघट में है पीर।
बंधन सारे तोड़कर, गोरी हुई अधीर॥

कजरारे नयना हंसे, गाल बने गुलाब।
रंग गुलाबी मन हुआ, मिलने को बेताब॥
-प्रेमचंद सोनवाने

कविता

इसीलिए तो होली हंसती आज है
इसी ठिठोली में फागुन की लाज है,
इसकी लाली में खिलता श्रंगार है
मलो अबीर गुलाल तुम्हे तो अधिकार है।
आओ आज प्यार कर लें फिर प्यार को
इसी रंग में रंग दें सब संसार को।
-शिवमंगल सिंह "सुमन"

रविवार, 14 फ़रवरी 2010

प्रेम ही परमात्मा है


प्रेम चतुर्दशी यानि वेलेंटाइन-डे का विरोध करना तो जैसे कुछ लोगों का कर्तव्य बन गया है। जब भी यह त्यौहार आता है ये लोग अपनी पिटी पिटाई दलीलों के जरिए इसका विरोध करना शुरु कर देते हैं। ये लोग तो इतना भी नहीं जानते कि जिन शिव के ये सैनिक होने का दावा करते हैं उन्ही शिव ने प्रेम के वशीभूत होकर ही पार्वती के बिछोह से क्षुब्द होकर स्रष्टि का प्रलय कर दिया था। जीसस, मीरा, क्रष्ण, महावीर, बुध्द आदि सभी ने प्रेम को स्वीकार किया है। जीसस का प्रसिध्द वचन है- प्रेम ही परमात्मा है। फिर ये लोग इतना भी नहीं जानते कि ये किसका विरोध कर रहे हैं प्रेम का या पाश्चात्य संस्क्रति का। यदि प्रेम का तो यह एक कुत्सित मानसिकता है और यदि पाश्चात्य संस्क्रति का तो ये सिर्फ अपने अहंकार का पोषण है। मान लीजिए यदि किसी भारतीय पर्व को विदेशों में इस तरह मनाया जाय तब भी क्या ये इसी प्रकार विरोध करेंगे? प्रेम तो वह मार्ग है जिस पर चलकर परमात्मा को पाया जाता है। रामक्रष्ण ने एक बार अपने शिष्य से कहा था कि यदि तुमने संसार में किसी से भी प्रेम किया हो तो मैं उसे शुध्द करके तुम्हारा साक्षात्कार परमात्मा से करा सकता हूं परंतु यदि तुमने किसी से भी प्रेम नहीं किया है तो तुम्हें परमात्मा से मिला पाना कठिन है। समाज के तथाकथित ठेकेदार उसी प्रेम की संभावना को नष्ट करने की कोशिश कर रहे हैं।हालांकि इस प्रकार विरोध प्रदर्शन करके वो इसे और स्थापित कर रहे हैं। इस बात से वो अनजान हैं क्योंकि जिस चीज़ को जितना दबाया जाता है वह उतनी ही उद्दीप्त होकर प्रकट होती है। आज आवश्यकता प्रेम के विरोध की नहीं बल्कि प्रेम के शुध्दिकरण की है। प्रेम का विरोध तो स्वयं परमात्मा का विरोध है इसलिये ही संत कबीर ने कहा है-
"पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ, पंडित भया ना कोय !
ढ़ाई आखर प्रेम का, पढै सो पंडित होय !!

- हेमन्त रिछारिया

शुक्रवार, 8 जनवरी 2010

दे दान, दे बलिदान!



चाहिए क्या तुम्हें,
हंसते-महकते गुलाबों की सुगन्ध?
तो राह कांटो की करो स्वीकार।
देखना है क्या तुम्हें,
प्रात: के सूर्य बिम्ब की हंसती सौंदर्य-राशि?
तो दूर भगाओ मध्यरात्रि से स्याह-काले क्षण।
चाहिए क्या तुम्हें,
स्वर्गानन्द स्वतंत्रता का;
और मधुर फल मुक्ति का?
तो फिर अदा करो उसकी कीमत,
आजादी को चाहिए
दु:ख; वेदना और बलिदान!
दे दान, दे बलिदान !!
- सुभाषचंद्र बोस

(महानायक, प्र.क्र.२२४)

मेरे सपनों का भारत





" हमें चाहिए एक शक्ति-संपन्न संघराज्य, जहां किसानों और मजदूरों की हिमायत करने वाली जागरूक सरकार हो।
रूस की तरह पंचवार्षिक नियोजन हो, देश में आधारभूत उद्योगों और औद्योगीकरण की बुनियाद डाली जाय, ग्रामोद्योगों को भी
प्रोत्साहन मिले, जनसंख्या व्रद्धि पर समयोचित अंकुश लगाया जाय, जात-पात का भेदभाव समाप्त हो, विभिन्न भाषा-भाषियों में अपनत्व बढ़े। अपनी ही माटी की गंध से रचा-बना हम एक ऐसा नया साम्यवाद ले आएं जो प्राचीन काल की ही भांति आधुनिक काल में भी विश्व का नेत्रत्व करे।"

-नेताजी सुभाषचंद्र बोस
(महानायक, प्र.क्र.२२७)

आजादी का गाना


मन कहता है लिखो आज तुम आजादी का गाना
मात्रभूमि के दीवानों का गाओ एक तराना ॥

एक समय था पारतंत्र्य के लगे हुए थे बन्ध
प्राणों पर पहरा लगता था, वाणी पर प्रतिबन्ध।
भाई की गर्दन, भाई की असि ही चूम रही थी,
देश-द्रोहियों के चरणों पर लक्ष्मी झूम रही थी।
शिक्षा; दीक्षा और परीक्षा, सब पर अनुशासन था,
जहां फिरंगी हमें बिठाएं, वह ही निज आसन था।
प्रथ्वी;वायु;गगन पर केवल उनका था अधिकार,
जो वे कहते, मन मसोस कर करते हम स्वीकार।
किन्तु देश के कुछ वीरों ने इसको सत्य न माना।
मन कहता है लिखो आज तुम आजादी का गाना॥


//१//


उर स्पंदित हुआ, बुद्धि में व्याकुलता छाई।
स्वतंत्रता के महायग्य-हित नव-चेतना आई॥
जिसके मुख को स्वाद लगा हो, रक्त सदा पीने का।
वह कब शीघ्र स्वत्व देता है मानव को जीने का॥
अत्याचारों की परंपरा ने ले ली अंगड़ाई।
हाथों में हथकड़ी पैर में बेड़ी गई पहनाई॥
देशभक्त की अंतरात्मा इस में भी मुस्काई।
बेड़ी की झन-झन में उसको वीणा पड़ी सुनाई॥
तप:पूत ऐसे जीवन को मस्तक सदा झुकाना।
मन कहता है लिखो आज तुम आजादी का गाना॥


//३//


यह आजादी पूज्य तिलक की वाणी से आई है।
यह आजादी भगतसिंह की फांसी ला पाई है॥
इस आजादी ने मांगे हैं बड़े-बड़े प्रतिदान।
बिस्मिल,शेखर और बोस का वह महान बलिदान॥
यह आजादी गांधीजी का सत्याग्रह लाया है।
मालवीय की नैष्ठिक चर्या से इसको पाया है॥
आजादी का दुर्ग बन गया ध्वज फहरा अपना है।
जिनके तन-मन प्राण रक्त से इतना भव्य बना है॥
देशवादियों! उनके प्रति ही मत क्रतघ्न बन जाना।
मन कहता है लिखो आज तुम आजादी का गाना॥


-प.पू. स्वामी सत्यमित्रानन्द जी

पुष्प की अभिलाषा


चाह नहीं मैं सुरबाला के गहनों में गूंथा जाऊं,
चाह नहीं प्रेमी माला में बिंध प्यारी को ललचाऊं,
चाह नहीं सम्राटों के शव पर हे हरि डाला जाऊं,
चाह नहीं देवों के सिर पर चढूं भाग्य पर इतराऊं,



मुझे तोड़ लेना वनमाली,
उस पथ पर देना तुम फेंक !
मात्रभूमि पर शीश चढ़ाने,
जिस पथ जावें वीर अनेक !!

-स्व.माखनलाल चतुर्वेदी

बुधवार, 6 जनवरी 2010

"आपको अधिकार न था"


शहीदे-आज़म भगत सिंह का पत्र

(३० सित. १९३० को भगतसिंह के पिता सरदार किशनसिंह ने ट्रिब्यूनल को एक अर्जी देकर बचाव पेश करने के लिए अवसर की मांग की। उससे आहत होकर भगतसिंह ने ४ अक्टूबर १९३० को अपने पिता को यह पत्र लिखा)

पूज्य पिता जी,

मुझे यह जानकर हैरानी हुई है कि आपने मेरे बचाव-पक्ष के लिए स्पेशल ट्रिब्यूनल को आवेदन भेजा है। यह खबर इतनी यातनामय थी कि मैं इसे खामोशी से बर्दाश्त नहीं कर सका। इस खबर ने मेरे भीतर की शांति भंग कर उथल-पुथल मचा दी है। मैं यह नहीं समझ सकता कि वर्तमान स्थितियॊं में और इस मामले पर आप किस तरह का आवेदन दे सकते हैं? आपका पुत्र होने के नाते मैं आपकी पैत्रक भावनाओं और इच्छाओं का पूरा सम्मान करता हूं। लेकिन इसके बावजूद मैं समझता हूं कि आपको मेरे साथ सलाह-मशविरा किये बिना ऐसे आवेदन देने का कोई अधिकार नहीं था।
पिता जी, मैं बहुत दु:ख का अनुभव कर रहा हूं। मुझे भय है आप पर दोषारोपण करते हुए या इससे बढ़कर आपके इस काम की निंदा करते हुए मैं कहीं सभ्यता की सीमाएं न लांघ जाऊं और मेरे शब्द ज़्यादा सख़्त न हों जाएं। लेकिन मैं स्पष्ट शब्दों में अपनी बात अवश्य कहूंगा। यदि कोई अन्य व्यक्ति मुझसे ऐसा व्यवहार करता तो मैं इसे गद्दारी से कम न मानता, लेकिन आपके संदर्भ में मैं इतना ही कहूंगा कि यह एक कमजोरी है; निचले स्तर की कमजोरी।

आपका
भगतसिंह

मंगलवार, 5 जनवरी 2010

आओ मन गांठे खोलें

यमुना तट, टीले रेतीले
घास फूस का घर डंडे पर
गोबर से लीपे आंगन में,
तुलसी का बिरवा; घंटी स्वर,
मां के मुंह से दोहे चौपाई रस घोलें,
आओं मन की गांठें खोलें!!

बाबा की बैठक में बिछी
चटाई बाहर रखें खड़ाऊं
मिलने वाले के मन में
असमंजस; जाऊं कि ना जाऊं?
माथे तिलक; आंख पर ऐनक; पोथी खुली स्वयं से बोले,
आओ मन की गांठे खोलें!!

सरस्वती की देख साधना
लक्ष्मी ने संबंध न जोड़ा
मिट्टी ने माथे का चंदन
बनने का संकल्प न छोड़ा
नये वर्ष की अगुवानी में
टुक रुक लें, कुछ ताजा हो लें!
आओ मन की गांठे खोलें !!

-श्री अटल बिहारी वाजपेयी
(भूतपूर्व प्रधानमंत्री)

ग़ज़ल

जिंदगी को मुहब्बत से निखारा जाए
इस हवेली को ज़रा और संवारा जाए।

माना, मुश्किल है बड़ा जीतना इसको लेकिन
खेल जीवन का भला किसलिए हारा जाए।

कोई तो होती है दु:ख सहने की हद ए यारो
कब तलक जीस्त में ये ज़हर उतारा जाए।

रोज़ ही पड़ती है कुछ गर्द जहां की इन पर
रोज़ ही क्यों न दिल-ओ-जां को बुहारा जाए।

पहली बौछार है सावन की उमंगों से भरी
जी में आता है कि साजन को पुकार जाए।

सच ही कहते हो कि उम्मीद पे जग जीता है
घर को ए "प्राण" चलों यूं ही उबारा जाए।
-प्राण

शुक्रवार, 1 जनवरी 2010

नववर्ष मंगलमय हो


सरल-चेतना के सभी पाठकों को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं
-संपादक

प्रार्थना


ज्योति जला निज प्राण की

ज्योति जला निज प्राण की, बाती गढ़ बलिदान की
आओ हम सब चलें उतारें, मां की पावन आरती
यह वसुंधरा मां जिसकी, गोद में हमने जन्म लिया।
खाकर जिसका अन्न-अमरत सम, निर्मल शीतल नीर पिया॥
श्वासें भरीं समीर में, जिसका रक्त शरीर में।
आज उसी की व्याकुल होकर, ममता हमें पुकारती॥

//२//

जिसका मणिमय मुकुट सजाती, स्वर्णमयी कंचन जंघा।
जिसके वक्षस्थल से बहती, पावनतम यमुना-गंगा॥
संध्या रचे महावरी, गाये गीत विभावरी।
अरूण करों से ऊषा सलोनी, जिसकी मांग संवारती॥

//३//

जिस धरती के अभिनंदन को, कोटि-कोटि जन साथ बढे़।
जिसके चरणों के वंदन को, कोटि-कोटि तन-माथ चढ़े॥
लजा न जिसके क्षीर को, त्रण-सा तजा शरीर को।
अमर शहीदों की यशगाथा, जिसका स्नेह दुलारती॥

//४//

देखो इसीं धरा जननी पर, संकट के घन छाये हैं।
घनीभूत होकर सीमाओं पर, फिर से घिर आये हैं॥
शपथ तुम्हें अनुराग की, लुटते हुए सुहाग की।
पल भर की देरी न तनिक, माता खड़ी निहारती॥
चलें उतारें आरती, मां की पावन आरती...
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