शुक्रवार, 13 नवंबर 2009

नगरीय निकाय चुनाव में भाजपा की स्थिति

नगरीय निकायों में चुनाव की घोषणा होते ही राजनैतिक गतिविधियां तेज़ हो गई हैं। भाजपा के लिये यह चुनाव अत्यंत मह्त्वपूर्ण है क्योंकि हाल ही में हुए उप चुनावों में जिस तरह से पार्टी का सूपडा़ साफ हुआ है वह पार्टी के अस्तित्व के लिये एक गंभीर चिंता का विषय है। आज भाजपा एक अदद नेत्रत्व के लिये तरस रही है। वहीं पार्टी की छवि को लेकर भी जनता में असमंजस है। जहां एक ओर भाजपा अपने हिंदुत्ववादी चेहरे को बचा पाने में नाकाम दिखती है वहीं दूसरी ओर सेकुलर छवि बनाने में भी वह बुरी तरह असफल रही है। उसकी हालत ठीक ऐसी है कि ना ही खुदा मिला; ना विसाले-यार। भाजपा की सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि या तो वह कट्टर हिंदुत्व की बात करती है या उसके नेता सेकुलर छवि बनाने के मोह में जिन्ना का गुणगान करने लगते हैं और अपने ही दल के लोगों के कोपभाजन बन जाते हैं। इन सब बातों से जन मानस में एक कनफ्यूज़न पैदा होता है। जहां सत्तालोलुपता के चलते पार्टी ने कई बार अपनी मूल विचारधाराओं से समझौता किया है वहीं अपनी अंर्तकलह की वजह से गोविंदाचार्य, उमा भारती, जसवंत सिंह जैसे कद्दावर और "थिंक टैंक" माने जाने वाले नेताओं को खोया है। वरूण गांधी जैसे तेज-तर्रार युवा हिंदू चेहरे को भी पार्टी ने हाशिए पर धकेल रखा है। वहीं कांग्रेस ने बड़ी ही खूबसूरती से राहुल गांधी को एक संजीदा और कुशल युवा नेत्रत्व के रूप में स्थापित करने में सफलता प्राप्त कर ली है। जिसका खा़मियाज़ा यदा-कदा चुनावों में भाजपा को भुगतना पड़ता है। दल में सोच और नेत्रत्व का अभाव भाजपा के लिये गंभीर संकट का कारण बना है। बहरहाल, यहां हमारा मुख्य उद्देश्य नगरीय निकाय चुनावों में भाजपा की स्थिति का आंकलन करना है जिसकी प्रष्ठभूमि के लिये उपरोक्त बातों की चर्चा आवश्यक थीं। मप्र में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अच्छा काम तो कर रहें हैं पर यहां भी वे दलगत बुराईयों को दूर करने में अक्षम व असहाय दिखाई देते हैं यह बात हाल ही में हुए मंत्रिमंडल विस्तार में साफ तौर पर उभर कर सामने आई है। जिससे उनका कद प्रभावित हुआ है। मप्र में शिवराज सिंह की स्थिति सर्कस के शेर की भांति है जो कर तो बहुत कुछ सकता है पर अपने रिंग मास्टर के आगे विवश हो जाता है। यदि ऐसा नहीं होता तो वे विधायक जो पिछले सरकार में भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते बाहर कर दिये गए थे पुन: मंत्री पद प्राप्त करने में सफल नहीं हो पाते। शिवराज सरकार के मंत्री हो या निगम अध्यक्ष सभी आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे हुए हैं। कुछ तो मुख्यमंत्री से अपनी नज़दीकियों को भुनाने में लगे हैं तो कुछ दिल्ली के अपने आकाओं के वरदहस्त की बदौलत मुख्यमंत्री के स्वर्णिम मध्यप्रदेश के सपने को धता बता रहे हैं। कुल मिलाकर शिवराज सिंह अपने भ्रष्टाचारी मंत्रियों और बढ़ती गुटबाज़ी पर लगाम कसने में नाकाम रहे हैं। कम से कम ज़मीनी स्तर पर तो ऐसा ही लगता है। नगरीय निकाय चुनावों में भी कुछ ऐसी ही तस्वीर नज़र आती है। जहां छवि पर गुटबाजी हावी रहने वाली है। जहां कुछ नेतागण अपने तथाकथित त्याग को भुनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ेंगे वहीं वे जो मंत्रीपद की मलाई चखने से वंचित रह गये थे पूरी कोशिश करेंगे कि इस बार मेयर या अध्यक्ष की कुर्सी उन्हे या उनके किसी चहेते को मिले। यदि ऐसा नहीं हुआ तो आप खुद समझदार हैं कि वे क्या करेंगे। इस बार नगरीय निकाय चुनाव शिवराज सिंह और भाजपा दोनों के लिये एक कसौटी है जिससे प्रदेश और राष्ट्र में उनकी स्थिति का आंकलन हो सकेगा। टिकिट वितरण में यदि पार्टी अपने तथाकथित मानकों के अनुरूप ही चलती है और स्वच्छ, ईमानदार छवि और विकास के मुद्दे को ध्यान में रखते हुए "अंधा बांटे रेवड़ी" वाली कहावत को नकारने में सफल हो जाती है तो निश्चित ही मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस को कड़ी टक्कर दे सकती है। प्रदेश में कांग्रेस एक कमज़ोर विपक्ष की भूमिका में है परंतु अपनी अंर्तकलह और गुटबाजी से ऊपर उठकर भाजपा इसका फायदा ले सकेगी इसमें संदेह है। हाल ही में हुए उपचुनावों में मिली विजय से कांग्रेसी कार्यकर्ताओं के हौंसले बुलंद हैं और पार्टी उत्साह से भरपूर है सो वो इस परीक्षा में भी खरा उतरने का पूरा प्रयास करेगी। मुख्य मुकाबला भाजपा एवं कांग्रेस के बीच ही होना है। चूंकि यह नगरीय निकायों के चुनाव है इसलिये ऐसा माना जा सकता है कि इसमें केन्द्रीय नेत्रत्व या आलाकमान दखलंदाजी नहीं करेगा यदि वास्तव में ऐसा हुआ तो शिवराज सिंह को अपनी छवि के अनुरूप "सिंह-गर्जना" का पूरा मौका मिलेगा। नए मंत्री भी उत्साह से लबरेज़ हैं उन्हे अपने आकाओं को कुछ कर दिखाने का मौका जो मिला है। यदि इन सब के बाद भी पार्टी नगरीय निकाय चुनावों में खराब प्रदर्शन करती है तो उसे कम से कम दस साल के वनवास को भोगने के लिये तैयार रहना चाहिए।

-हेमन्त रिछारिया
संपादक "सरल-चेतना"