गुरुवार, 15 अक्तूबर 2009

दीपज्योति



शुभं करोतु कल्याणं आरोग्यं धन संपदा ।
शत्रुबुध्दि विनाशाय दीपज्योतिर्नमोस्तुते ॥
दीपज्योति: परब्रह्म दीपज्योतिर्जनार्दन:।
दीपो हरतु में पापं दीपज्योतिर्नामोस्तुते ॥

‍" हे दीपज्योति ! तू हमारा शुभ करने वाली, कल्याण करने वाली, हमें आरोग्य और धनसंपदा देने वाली ,
शत्रु बुध्दि का नाश करने वाली है। तुझे नमस्कार ! हे दीपज्योति ; तू परब्रह्म है, तू जनार्दन है, तू हमारे
पापों का नाश करती है, तुझे नमस्कार ।"

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