रविवार, 18 अक्तूबर 2009

चार दीपक सदा जगमगाते रहे.....

चांद सूरज दिये दो घड़ी के लिये
रोज़ आते रहे और जाते रहे
दो तुम्हारे नयन, दो हमारे नयन
चार दीपक सदा जगमगाते रहे।

मुख तुम्हारा अंधेरी डगर की शमा
रात बढ़ती गई तो हुआ चंद्र्मा
याद तुमको किया, रोज़ हमने जहां
आंधियों में वहीं छा गई पूर्णिमा
बादलों की झड़ी में जली फुलझड़ी,
बिजलियों में कमल मुस्कुराते रहे।
दो तुम्हारे नयन, दो हमारे नयन
चार दीपक सदा मुस्कुराते रहे॥

बीन तुम प्रीति की झनझनाती हुई
तुम हवा मेघ की सनसनाती हुई
हम हवा की लहर प्यार की राह पर
दर्द की रागिनी गुनगुनाती हुई
दूर तुमने किया, दर्द इतना दिया
हम जहां भी रहे गुनगुनाते रहे।

दो तुम्हारे नयन, दो हमारे नयन
चार दीपक सदा मुस्कुराते रहे॥

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