गुरुवार, 15 अक्तूबर 2009

दीप तुम जलो

दीप तुम जलो कि अंधकार जले, अहंकार जले
रोशनी तले अंधेरा रो-रो ढले
फुलझडी़ के फूल लगे बडे़ भले
अनार खिलखिलाए आधी रात ढले
रोशनी अंधेरे को, जिंदगी मौत को छ्ले
ज्योति-कलश आप लें कालिमा हाथ मले॥
दीप तुम जलो कि अंधकार जले......

(साभार: तंत्र ज्योतिष)



अंधेरा धरा पर कहीं रह न जाए.....

जलाओ दीये पर ध्यान रहे इतना
अंधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।

नई ज्योति के धर नए पंख झिलमिल,
उड़े मिट्टी गगन स्वर्ग छू ले,
लगे रोशनी की झड़ी झूम ऐसी,
निशा की गली में तिमिर राह भूले,
खुले मुक्ति का वह किरण द्वार जगमग,
ऊषा जा न पाए; निशा आ न पाए,
जलाओ दीये.......

स्रजन है अधूरा अगर विश्व भर में,
कहीं भी किसी द्वार पर है उदासी,
मनुजता नहीं तब तक पूर्ण बनेगी,
कि जब तक लहू के लिये भूमि प्यासी,
चलेगा नाश का खेल यूं ही,
भले ही दिवाली यहां रोज़ आए,
जलाओ दीये.....

मगर दीप की दीप्ति से जग में,
नहीं मिट सका है धरा का अंधेरा,
उतर क्यों न आएं नखत सब नयन के,
नहीं कर सकेंगे ह्रदय में उजेरा,
कटेंगे तभी यह अंधेरे घिरे अब,
स्वयं धर मनुज दीप का रूप आए,
जलाओ दीये पर रहे ध्यान इतना,
अंधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।

- गोपालदास "नीरज"

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