रविवार, 18 अक्तूबर 2009

चार दीपक सदा जगमगाते रहे.....

चांद सूरज दिये दो घड़ी के लिये
रोज़ आते रहे और जाते रहे
दो तुम्हारे नयन, दो हमारे नयन
चार दीपक सदा जगमगाते रहे।

मुख तुम्हारा अंधेरी डगर की शमा
रात बढ़ती गई तो हुआ चंद्र्मा
याद तुमको किया, रोज़ हमने जहां
आंधियों में वहीं छा गई पूर्णिमा
बादलों की झड़ी में जली फुलझड़ी,
बिजलियों में कमल मुस्कुराते रहे।
दो तुम्हारे नयन, दो हमारे नयन
चार दीपक सदा मुस्कुराते रहे॥

बीन तुम प्रीति की झनझनाती हुई
तुम हवा मेघ की सनसनाती हुई
हम हवा की लहर प्यार की राह पर
दर्द की रागिनी गुनगुनाती हुई
दूर तुमने किया, दर्द इतना दिया
हम जहां भी रहे गुनगुनाते रहे।

दो तुम्हारे नयन, दो हमारे नयन
चार दीपक सदा मुस्कुराते रहे॥

गुरुवार, 15 अक्तूबर 2009

दीपज्योति



शुभं करोतु कल्याणं आरोग्यं धन संपदा ।
शत्रुबुध्दि विनाशाय दीपज्योतिर्नमोस्तुते ॥
दीपज्योति: परब्रह्म दीपज्योतिर्जनार्दन:।
दीपो हरतु में पापं दीपज्योतिर्नामोस्तुते ॥

‍" हे दीपज्योति ! तू हमारा शुभ करने वाली, कल्याण करने वाली, हमें आरोग्य और धनसंपदा देने वाली ,
शत्रु बुध्दि का नाश करने वाली है। तुझे नमस्कार ! हे दीपज्योति ; तू परब्रह्म है, तू जनार्दन है, तू हमारे
पापों का नाश करती है, तुझे नमस्कार ।"

दीप तुम जलो

दीप तुम जलो कि अंधकार जले, अहंकार जले
रोशनी तले अंधेरा रो-रो ढले
फुलझडी़ के फूल लगे बडे़ भले
अनार खिलखिलाए आधी रात ढले
रोशनी अंधेरे को, जिंदगी मौत को छ्ले
ज्योति-कलश आप लें कालिमा हाथ मले॥
दीप तुम जलो कि अंधकार जले......

(साभार: तंत्र ज्योतिष)



अंधेरा धरा पर कहीं रह न जाए.....

जलाओ दीये पर ध्यान रहे इतना
अंधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।

नई ज्योति के धर नए पंख झिलमिल,
उड़े मिट्टी गगन स्वर्ग छू ले,
लगे रोशनी की झड़ी झूम ऐसी,
निशा की गली में तिमिर राह भूले,
खुले मुक्ति का वह किरण द्वार जगमग,
ऊषा जा न पाए; निशा आ न पाए,
जलाओ दीये.......

स्रजन है अधूरा अगर विश्व भर में,
कहीं भी किसी द्वार पर है उदासी,
मनुजता नहीं तब तक पूर्ण बनेगी,
कि जब तक लहू के लिये भूमि प्यासी,
चलेगा नाश का खेल यूं ही,
भले ही दिवाली यहां रोज़ आए,
जलाओ दीये.....

मगर दीप की दीप्ति से जग में,
नहीं मिट सका है धरा का अंधेरा,
उतर क्यों न आएं नखत सब नयन के,
नहीं कर सकेंगे ह्रदय में उजेरा,
कटेंगे तभी यह अंधेरे घिरे अब,
स्वयं धर मनुज दीप का रूप आए,
जलाओ दीये पर रहे ध्यान इतना,
अंधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।

- गोपालदास "नीरज"

मंगलवार, 13 अक्तूबर 2009

एक दीया होता है...


एक दीया होता है, जो सँध्या की आगवानी में नन्ही बिटिया के द्वारा तुलसी के बिरवे के सामने सँजोया जाता है।
एक दीया होता है, जो खतरे की सूचना देने वाले चौकीदार की तरह घने अँधकार में जलाया जाता है।
एक दीया होता है, जो बहन के द्वारा अपने भाई की आरती के लिये सँजोया जाता है।
एक दीया होता है, जो हल्दी भरे अंग वाली बहू के द्वारा सुख और सम्रध्दि की कामना के साथ एक परिवार से दूसरे परिवार में लाया जाता है।
एक दीया होता है, जो धरती पर आने वाले नये इन्सान के स्वागत में किसी बच्चे के जन्म लेने पर सँजोया जाता है।
एक दीया होता है, जिसके सहारे कोई विरहिणी अपने पिया की याद में सारी जिंदगी काट देती है।
एक दीया होता है, जिसकी लौ के तले वर-वधू पहली बार सुहाग कक्ष में एक-दूसरे का मुख निहारते हैं।
एक दीया होता है, जो जीवन की सम्पूर्ण पूजा समाप्त होने के उपरान्त प्रभु के चरणों में अर्पित किया किया जाता है।

जब इन सब दीयों को एक कतार में रख दिया जाता है तो दीपावली का त्यौहार बन जाता है।
 

"सरल-चेतना" के सभी सुधि पाठकों को दीपपर्व की हर्दिक शुभकामनाएं
- हेमंत रिछारिया (संपादक)