रविवार, 16 अगस्त 2009

माँ की गोदी


जब भी कश्ती मेरी सैलाब में आ जाती है
माँ दुआ करती हुई ख़्वाब में आ जाती है।
-मुनव्वर राणा



घर में झीने रिश्ते मैंने लाखों बार उधड़ते देखे
चुपके-चुपके कर देती जाने कब तुरपाई अम्मां।
-आलोक शरीवास्तव



बदन से तेरे आती है ए माँ वही खुशबू
जो इक पूजा के दीपक में पिघलते घी से आती है।
-डॉ॰ कुँअर बेचैन



बांट के अपना चेहरा, माथा, आंखें, जाने कहां गयी
फटे पुराने इक एलबम में चंचल लड़की जैसी मां।
-निदा फ़ाज़ली

जिसमें खुद भगवान ने खेले खेल विचित्र
मां की गोदी से नहीं कोई तीर्थ पवित्र
- नीरज