सोमवार, 2 मार्च 2009

बीन को नवीन तार चाहिये....

एक तार टूट-टूट जाये तो
बीन को नवीन तार चाहिये

था जिन्हे रखा बहुत सँवार कर,
था जिन्हे रखा बहुत दुलार कर,
रंग एक बार के उतर गये,
फूल एक बार के बिखर गये,
बाग चुप रहा समय निहारकर,
किंतु कह उठी पिकी पुकार कर,
इक बहार रूठ-रूठ जाये तो
बाग को नई बहार चाहिये
बीन को नवीन तार चाहिये....

उड चला विहग त्रण लिये हुए,
प्यार का अकंप प्रण लिये हुए,
किंतु तेज आंधियां मचल गईं,
त्रण बिखेर नीड को कुचल गईं,
लुट गया विहग, छा गई निशा
किंतु फिर पुकारने लगी उषा
एक नीड टूट-फूट जाये तो
डाल को नया सिंगार चाहिये
बीन को नवीन तार चाहिये....

मैं तुम्हे सदा दुलारता रहा,
प्राण में बसा सँवारता रहा,
किंतु एक दिन कहार आ गये,
पालकी उठा तुम्हें लिवा गये,
हर शपथ ज्वलित अंगार हो गई,
जिंदगी असह्य भार हो गई,
जब ह्रदय लगा चिता सँवारने,
व्योम के नखत लगे पुकारने,
एक मीत साथ छोड जाए तो
प्यार की नई पुकार चाहिए
बीन को नवीन तार चाहिये....

प्रस्तुति- अमोल

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