शनिवार, 28 फ़रवरी 2009

नज़रिया

इक इमारत लबे-जमनाबही अंदाज़ो-अदा,
मुगलिया दौर की ग़म्माज़ नज़र आती है
जब भी माहताब की हल्की सी किरण पडती है,
ताज के अक्स में मुमताज़ नज़र आती है
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ताज है इक इमारत मुझे तस्लीम मगर,
बंदा-ए-ज़र तुझे एजाज़ नज़र आती है
मैंने रिसते हुए देखा है गरीबों का लहू,
तुझको हँसती हुई मुमताज़ नज़र आती है
-एम.पी.कौल

1 टिप्पणी:

naturica ने कहा…

मज़ा आ गया भाई । इसी मुआमले पर एक और नज़रिया naturica पर...