गुरुवार, 12 फ़रवरी 2009

युग पुरुष

(१) प्रतिशोध

आज शांत है नारी
रंगकर कुन्तल काले
मनुज रक्त से
बांध चुकी है
वेणी अपनी,
वह वेणी जिसकी अलकों ने
लहर-लहर कर
सदा हवा दी
द्वेष अनल को;
वह वेणी जो खुली रही
वनवास काल में
बल खाती काली नागिन सी
नित्य सँजोती रही गरल
कुरु-कुल खाने को!
//
(२) स्म्रति

एकाकी क्षण में
जब भी व्याकुल होता हूं,
वे ही स्म्रति आई हैं
साथ निभाने; साहस देने
शक्ति बढाने; ध्रैय धराने
व्याकुलता की इस बेला में
महानाश में व्यग्र ह्र्दय का
स्पन्दन बन,
महाचिता के विकट ताप में
शीतलता बन;
स्म्रतियाँ जो युगों बाद भी
चिर नवीन हैं!
//
(३) रण छोड

हुआ प्रबल आक्रमण
समय पर जरसंध का;
अगर चाहता तो कर देता
दिव्यायुध से नाश शत्रु का
एक निमिष में!
किन्तु उचित था नहीं आज यह;
साथ खडा था मगध राज के
वह समाज भी;
जो अभिन्न हिस्सा था
अपनी भारत-भूमि का;
यह विचार कर
उद्यत था मैं,
समर-भूमि को त्याग
निकल जाने को रण से;
पर दाऊ थे चाह रहे
दुश्मन से लडना
संगर के निर्णायक क्षण तक
कहने लगे-
कलंक लगेगा समर भूमि से
हट जाने में,
लोक कहेगा कायर थे
बलराम-श्याम जो
जरासन्ध के भय से भागे,
तब अग्रज से किया निवेदन-
"तात! अगर तज आज समर
हुम निकल चलेंगे,
तो न नष्ट होगी
भारत की यह प्रभुसत्ता;
खडी हुई है जो विरोध में
आज हमारे,
जरसन्ध के भय के कारण
अनुचित होगा अपने यश के लिये मिटाना,
समर शक्ति सारे भारत की
लोक कहे कायर मुझको
यह स्वीकार है,
पर ना चाह्ता ह्त्या करना
मात्रभूमि के इन वीरों की;
जिन्हे बाँध भय की डोरी से
खडा किया है मगध राज ने
बलि पशुओं सा
समर यग्य में.
मैं जग में 'रण-छोड' कहाता
चला सुरक्षित पर्वत तजकर;
मुझको अपयश मिला,
किन्तु बच गई शक्तियाँ
अखिल देश की;
महत लक्षय पाने को मैंने
बलि दे दी अपने शुभ यश की
अनिवार्य थी जो विप्ति की
विकट घडी में,
राष्ट्र हित में;
देश बडा है मेरे
यश-अपयश से बढकर!

-डा.क्रष्णगोपाल मिश्र

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