शुक्रवार, 2 जनवरी 2009

हो रहे हो तुम विदा तो यूं लगा जैसे
फूल से खुशबू विदाई ले रही है
हैं बहुत खामोश बुलबुल के तराने
अनमनी सी चाह की सब तितलियाँ है
जल ह्र्दय के ताल का ठहरा हुआ है
सुप्त भावों की हज़ारों मछलियाँ हैं
और हर इक याद बनकर नववधू अब
आंसुओं की मुँह दिखाई ले रही है
//२//
जो मिला उसको बिछडना ही पडा है
प्रीति के घर की रही ये ही प्रथाएँ
आ गई मन की व्यथाएँ शब्द बनकर
बन गई गीत बिछुडन की कथाएँ
गीत लिख्नने के लिये मन की कलम अब
आंसुओं की रोशनाई ले रही है!

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