शुक्रवार, 18 दिसंबर 2009

मध्यप्रदेश जय हे....

जय जय मध्यप्रदेश जय हे !
विशालभारतवर्षह्रदय हे !
जय जय मध्यप्रदेश जय हे....
***
विन्ध्याचलमेखला नर्मदा
वहति लोकजीवनं सर्वदा !
विततसतपुडा श्रंगश्रंखला
तव वनधनशोभासमुज्जवला !!
क्षिप्राचंबल नदी सदय हे !
जय जय .............
***
जयति झाबुआलोकजीवनं
चित्रकूट तट रामकीर्तनमं !
कथयति सांची तवेतिहासं
खजुराहो तव कलाविलासमं !!
अभ्यारण-पुण्यपरिचय हे !
जय जय ....................
***
कालिदासधरणी सुसंस्क्रता
तानसेन-संगीत-झंक्रता
तव विक्रम-संवत्सर-रूचिरा
विविध रत्नगर्भा वसुंधरा !!
पंचराज्य-वलयति-परिसर हे !
जय जय मध्यप्रदेश........

-श्रीनिवास रथ

कितने योग्य गडकरी

भारतीय जनता पार्टी में अध्यक्ष पद को लेकर चला आ रहा घमासान नितिन गडकरी के रूप में खत्म होता नज़र आ रहा है। परंतु बीजेपी में आए इस तूफान का यूं चुपके से गुज़र जाना कहीं आने वाली भयंकर तबाही का पूर्व संकेत तो नहीं? संघ प्रमुख मोहन भागवत ने भाजपा के शीर्ष पद पर अपनी पसंद के अनुरूप नितिन गडकरी की ताजपोशी के लिये पार्टी के आला नेताओं को लगभग सहमत तो कर लिया है पर क्या वे गडकरी को इस पद के योग्य बना पाने में सफल होंगे? नितिन गडकरी मराठी मानुष के रूप में महाराष्ट्र में लोकप्रिय हो सकते हैं पर क्या वे देश के आम बीजेपी कार्यकर्ता की पहली पसंद हैं? जो व्यक्ति कभी चुनाव लडकर संसद के दरवाज़े तक नहीं पहुंचा और जिसके नेत्रत्व में पार्टी प्रदेश में अपनी हार बचा पाने में असफल रही क्या वो राष्ट्रीय अध्य्क्ष के रूप में पार्टी में नई जान फूंकने में सफल हो पाएगा? इन सब प्रश्नों के उत्तर आज नहीं तो कल गडकरी को अध्यक्ष की कुर्सी तक पहुंचाने वालों को खोजने ही होंगे। आज भाजपा को ऐसे सशक्त नेत्रत्व की आवश्यकता है जो ना सिर्फ दल की अंतर्कलह पर लगाम लगा सके बल्कि आम जनता के बीच पार्टी की गिरती साख को भी बचा सके। जिसके पास एक विचारधारा हो और जो निरूत्साहित कार्यकर्ताओं में उत्साह का संचार कर सके। हिंदुत्व कोई सांप्रदायिक विचारधारा ना होकर एक राष्ट्रवादी चिंतन है इस बात को जितने सटीक ढंग से संप्रेषित किया जाएगा उतना पार्टी विकास के नए आयाम तय करेगी और मजबूत होगी। परंतु कमोबेश हर अध्यक्ष हिंदुत्व की व्याख्या करने में असफ्ल साबित हुआ और पार्टी अपना जनाधार खोती रही। ऐसे मौके पर गोविंदाचार्य, उमा भारती, जसवंत सिंह, यशवंत सिन्हा जैसे नेताओं के मार्गदर्शन की कमी हमेशा खलती रहेगी। नितिन गडकरी इन चुनौतियों पर खरे उतरें ऐसी दुआ तो की ही जा सकती है पर यह दुआ कितनी कबूल होती है यह तो आने वाला समय ही बताएगा।
- हेमंत रिछारिया

शुक्रवार, 13 नवंबर 2009

नगरीय निकाय चुनाव में भाजपा की स्थिति

नगरीय निकायों में चुनाव की घोषणा होते ही राजनैतिक गतिविधियां तेज़ हो गई हैं। भाजपा के लिये यह चुनाव अत्यंत मह्त्वपूर्ण है क्योंकि हाल ही में हुए उप चुनावों में जिस तरह से पार्टी का सूपडा़ साफ हुआ है वह पार्टी के अस्तित्व के लिये एक गंभीर चिंता का विषय है। आज भाजपा एक अदद नेत्रत्व के लिये तरस रही है। वहीं पार्टी की छवि को लेकर भी जनता में असमंजस है। जहां एक ओर भाजपा अपने हिंदुत्ववादी चेहरे को बचा पाने में नाकाम दिखती है वहीं दूसरी ओर सेकुलर छवि बनाने में भी वह बुरी तरह असफल रही है। उसकी हालत ठीक ऐसी है कि ना ही खुदा मिला; ना विसाले-यार। भाजपा की सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि या तो वह कट्टर हिंदुत्व की बात करती है या उसके नेता सेकुलर छवि बनाने के मोह में जिन्ना का गुणगान करने लगते हैं और अपने ही दल के लोगों के कोपभाजन बन जाते हैं। इन सब बातों से जन मानस में एक कनफ्यूज़न पैदा होता है। जहां सत्तालोलुपता के चलते पार्टी ने कई बार अपनी मूल विचारधाराओं से समझौता किया है वहीं अपनी अंर्तकलह की वजह से गोविंदाचार्य, उमा भारती, जसवंत सिंह जैसे कद्दावर और "थिंक टैंक" माने जाने वाले नेताओं को खोया है। वरूण गांधी जैसे तेज-तर्रार युवा हिंदू चेहरे को भी पार्टी ने हाशिए पर धकेल रखा है। वहीं कांग्रेस ने बड़ी ही खूबसूरती से राहुल गांधी को एक संजीदा और कुशल युवा नेत्रत्व के रूप में स्थापित करने में सफलता प्राप्त कर ली है। जिसका खा़मियाज़ा यदा-कदा चुनावों में भाजपा को भुगतना पड़ता है। दल में सोच और नेत्रत्व का अभाव भाजपा के लिये गंभीर संकट का कारण बना है। बहरहाल, यहां हमारा मुख्य उद्देश्य नगरीय निकाय चुनावों में भाजपा की स्थिति का आंकलन करना है जिसकी प्रष्ठभूमि के लिये उपरोक्त बातों की चर्चा आवश्यक थीं। मप्र में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अच्छा काम तो कर रहें हैं पर यहां भी वे दलगत बुराईयों को दूर करने में अक्षम व असहाय दिखाई देते हैं यह बात हाल ही में हुए मंत्रिमंडल विस्तार में साफ तौर पर उभर कर सामने आई है। जिससे उनका कद प्रभावित हुआ है। मप्र में शिवराज सिंह की स्थिति सर्कस के शेर की भांति है जो कर तो बहुत कुछ सकता है पर अपने रिंग मास्टर के आगे विवश हो जाता है। यदि ऐसा नहीं होता तो वे विधायक जो पिछले सरकार में भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते बाहर कर दिये गए थे पुन: मंत्री पद प्राप्त करने में सफल नहीं हो पाते। शिवराज सरकार के मंत्री हो या निगम अध्यक्ष सभी आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे हुए हैं। कुछ तो मुख्यमंत्री से अपनी नज़दीकियों को भुनाने में लगे हैं तो कुछ दिल्ली के अपने आकाओं के वरदहस्त की बदौलत मुख्यमंत्री के स्वर्णिम मध्यप्रदेश के सपने को धता बता रहे हैं। कुल मिलाकर शिवराज सिंह अपने भ्रष्टाचारी मंत्रियों और बढ़ती गुटबाज़ी पर लगाम कसने में नाकाम रहे हैं। कम से कम ज़मीनी स्तर पर तो ऐसा ही लगता है। नगरीय निकाय चुनावों में भी कुछ ऐसी ही तस्वीर नज़र आती है। जहां छवि पर गुटबाजी हावी रहने वाली है। जहां कुछ नेतागण अपने तथाकथित त्याग को भुनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ेंगे वहीं वे जो मंत्रीपद की मलाई चखने से वंचित रह गये थे पूरी कोशिश करेंगे कि इस बार मेयर या अध्यक्ष की कुर्सी उन्हे या उनके किसी चहेते को मिले। यदि ऐसा नहीं हुआ तो आप खुद समझदार हैं कि वे क्या करेंगे। इस बार नगरीय निकाय चुनाव शिवराज सिंह और भाजपा दोनों के लिये एक कसौटी है जिससे प्रदेश और राष्ट्र में उनकी स्थिति का आंकलन हो सकेगा। टिकिट वितरण में यदि पार्टी अपने तथाकथित मानकों के अनुरूप ही चलती है और स्वच्छ, ईमानदार छवि और विकास के मुद्दे को ध्यान में रखते हुए "अंधा बांटे रेवड़ी" वाली कहावत को नकारने में सफल हो जाती है तो निश्चित ही मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस को कड़ी टक्कर दे सकती है। प्रदेश में कांग्रेस एक कमज़ोर विपक्ष की भूमिका में है परंतु अपनी अंर्तकलह और गुटबाजी से ऊपर उठकर भाजपा इसका फायदा ले सकेगी इसमें संदेह है। हाल ही में हुए उपचुनावों में मिली विजय से कांग्रेसी कार्यकर्ताओं के हौंसले बुलंद हैं और पार्टी उत्साह से भरपूर है सो वो इस परीक्षा में भी खरा उतरने का पूरा प्रयास करेगी। मुख्य मुकाबला भाजपा एवं कांग्रेस के बीच ही होना है। चूंकि यह नगरीय निकायों के चुनाव है इसलिये ऐसा माना जा सकता है कि इसमें केन्द्रीय नेत्रत्व या आलाकमान दखलंदाजी नहीं करेगा यदि वास्तव में ऐसा हुआ तो शिवराज सिंह को अपनी छवि के अनुरूप "सिंह-गर्जना" का पूरा मौका मिलेगा। नए मंत्री भी उत्साह से लबरेज़ हैं उन्हे अपने आकाओं को कुछ कर दिखाने का मौका जो मिला है। यदि इन सब के बाद भी पार्टी नगरीय निकाय चुनावों में खराब प्रदर्शन करती है तो उसे कम से कम दस साल के वनवास को भोगने के लिये तैयार रहना चाहिए।

-हेमन्त रिछारिया
संपादक "सरल-चेतना"

रविवार, 18 अक्तूबर 2009

चार दीपक सदा जगमगाते रहे.....

चांद सूरज दिये दो घड़ी के लिये
रोज़ आते रहे और जाते रहे
दो तुम्हारे नयन, दो हमारे नयन
चार दीपक सदा जगमगाते रहे।

मुख तुम्हारा अंधेरी डगर की शमा
रात बढ़ती गई तो हुआ चंद्र्मा
याद तुमको किया, रोज़ हमने जहां
आंधियों में वहीं छा गई पूर्णिमा
बादलों की झड़ी में जली फुलझड़ी,
बिजलियों में कमल मुस्कुराते रहे।
दो तुम्हारे नयन, दो हमारे नयन
चार दीपक सदा मुस्कुराते रहे॥

बीन तुम प्रीति की झनझनाती हुई
तुम हवा मेघ की सनसनाती हुई
हम हवा की लहर प्यार की राह पर
दर्द की रागिनी गुनगुनाती हुई
दूर तुमने किया, दर्द इतना दिया
हम जहां भी रहे गुनगुनाते रहे।

दो तुम्हारे नयन, दो हमारे नयन
चार दीपक सदा मुस्कुराते रहे॥

गुरुवार, 15 अक्तूबर 2009

दीपज्योति



शुभं करोतु कल्याणं आरोग्यं धन संपदा ।
शत्रुबुध्दि विनाशाय दीपज्योतिर्नमोस्तुते ॥
दीपज्योति: परब्रह्म दीपज्योतिर्जनार्दन:।
दीपो हरतु में पापं दीपज्योतिर्नामोस्तुते ॥

‍" हे दीपज्योति ! तू हमारा शुभ करने वाली, कल्याण करने वाली, हमें आरोग्य और धनसंपदा देने वाली ,
शत्रु बुध्दि का नाश करने वाली है। तुझे नमस्कार ! हे दीपज्योति ; तू परब्रह्म है, तू जनार्दन है, तू हमारे
पापों का नाश करती है, तुझे नमस्कार ।"

दीप तुम जलो

दीप तुम जलो कि अंधकार जले, अहंकार जले
रोशनी तले अंधेरा रो-रो ढले
फुलझडी़ के फूल लगे बडे़ भले
अनार खिलखिलाए आधी रात ढले
रोशनी अंधेरे को, जिंदगी मौत को छ्ले
ज्योति-कलश आप लें कालिमा हाथ मले॥
दीप तुम जलो कि अंधकार जले......

(साभार: तंत्र ज्योतिष)



अंधेरा धरा पर कहीं रह न जाए.....

जलाओ दीये पर ध्यान रहे इतना
अंधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।

नई ज्योति के धर नए पंख झिलमिल,
उड़े मिट्टी गगन स्वर्ग छू ले,
लगे रोशनी की झड़ी झूम ऐसी,
निशा की गली में तिमिर राह भूले,
खुले मुक्ति का वह किरण द्वार जगमग,
ऊषा जा न पाए; निशा आ न पाए,
जलाओ दीये.......

स्रजन है अधूरा अगर विश्व भर में,
कहीं भी किसी द्वार पर है उदासी,
मनुजता नहीं तब तक पूर्ण बनेगी,
कि जब तक लहू के लिये भूमि प्यासी,
चलेगा नाश का खेल यूं ही,
भले ही दिवाली यहां रोज़ आए,
जलाओ दीये.....

मगर दीप की दीप्ति से जग में,
नहीं मिट सका है धरा का अंधेरा,
उतर क्यों न आएं नखत सब नयन के,
नहीं कर सकेंगे ह्रदय में उजेरा,
कटेंगे तभी यह अंधेरे घिरे अब,
स्वयं धर मनुज दीप का रूप आए,
जलाओ दीये पर रहे ध्यान इतना,
अंधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।

- गोपालदास "नीरज"

मंगलवार, 13 अक्तूबर 2009

एक दीया होता है

एक दीया होता है, जो संध्या की आगवानी में नन्ही बिटिया के द्वारा तुलसी के बिरवे के सामने संजोया जाता है।
एक दीया होता है, जो खतरे की सूचना देने वाले चौकीदार की तरह घने अंधकार में जलाया जाता है।
एक दीया होता है, जो बहन के द्वारा अपने भाई की आरती के लिये संजोया जाता है।
एक दीया होता है, जो हल्दी भरे अंग वाली बहू के द्वारा सुख और सम्रध्दि की कामना के साथ एक परिवार से दूसरे परिवार में लाया जाता है।
एक दीया होता है, जो धरती पर आने वाले नये इंसान के स्वागत में किसी बच्चे के जन्म लेने पर संजोया जाता है।
एक दीया होता है, जिसके सहारे कोई विरहिणी अपने पिया की याद में सारी जिंदगी काट देती है।
एक दीया होता है, जिसकी लौ के तले वर-वधू पहली बार सुहाग कक्ष में एक-दूसरे का मुख निहारते हैं।
एक दीया होता है, जो जीवन की संपूर्ण पूजा समाप्त होने के उपरांत प्रभु के चरणों में अर्पित किया किया जाता है।
और जब इन सब दीयों को एक कतार में रख दिया जाता है तो दीपावली का त्यौहार बन जाता है।

"सरल-चेतना" के सभी सुधि पाठकों को दीपपर्व की हर्दिक शुभकामनाएं- हेमंत रिछारिया (संपादक)


रविवार, 16 अगस्त 2009

माँ की गोदी


जब भी कश्ती मेरी सैलाब में आ जाती है
माँ दुआ करती हुई ख़्वाब में आ जाती है।
-मुनव्वर राणा



घर में झीने रिश्ते मैंने लाखों बार उधड़ते देखे
चुपके-चुपके कर देती जाने कब तुरपाई अम्मां।
-आलोक शरीवास्तव



बदन से तेरे आती है ए माँ वही खुशबू
जो इक पूजा के दीपक में पिघलते घी से आती है।
-डॉ॰ कुँअर बेचैन



बांट के अपना चेहरा, माथा, आंखें, जाने कहां गयी
फटे पुराने इक एलबम में चंचल लड़की जैसी मां।
-निदा फ़ाज़ली

जिसमें खुद भगवान ने खेले खेल विचित्र
मां की गोदी से नहीं कोई तीर्थ पवित्र
- नीरज

सोमवार, 2 मार्च 2009

बीन को नवीन तार चाहिये....

एक तार टूट-टूट जाये तो
बीन को नवीन तार चाहिये

था जिन्हे रखा बहुत सँवार कर,
था जिन्हे रखा बहुत दुलार कर,
रंग एक बार के उतर गये,
फूल एक बार के बिखर गये,
बाग चुप रहा समय निहारकर,
किंतु कह उठी पिकी पुकार कर,
इक बहार रूठ-रूठ जाये तो
बाग को नई बहार चाहिये
बीन को नवीन तार चाहिये....

उड चला विहग त्रण लिये हुए,
प्यार का अकंप प्रण लिये हुए,
किंतु तेज आंधियां मचल गईं,
त्रण बिखेर नीड को कुचल गईं,
लुट गया विहग, छा गई निशा
किंतु फिर पुकारने लगी उषा
एक नीड टूट-फूट जाये तो
डाल को नया सिंगार चाहिये
बीन को नवीन तार चाहिये....

मैं तुम्हे सदा दुलारता रहा,
प्राण में बसा सँवारता रहा,
किंतु एक दिन कहार आ गये,
पालकी उठा तुम्हें लिवा गये,
हर शपथ ज्वलित अंगार हो गई,
जिंदगी असह्य भार हो गई,
जब ह्रदय लगा चिता सँवारने,
व्योम के नखत लगे पुकारने,
एक मीत साथ छोड जाए तो
प्यार की नई पुकार चाहिए
बीन को नवीन तार चाहिये....

प्रस्तुति- अमोल

तस्वीर

जो तस्वीर बनाई अपनी,
वह तस्वीर तुम्हारी निकली
जब-जब अपना चित्र बनाया
तब-तब ध्यान तुम्हारा आया
मन में कौंध गई बिजली -सी
छवि का इंन्द्रधनुष मुसकाया
सुख की एक घटा सी छाई
भीग गया जीवन आंगन-सा

घूम गई कूंची दिवानी, हर रेखा मतवाली निकली
जो अपनी तस्वीर बनाई, वह तस्वीर तुम्हारी निकली

मेरा रूप तुम्हारा निकला,
मेरा रंग तुम्हारा निकला,
जो अपनी मुद्रा समझी थी,
वह तो ढंग तुम्हारा निकला
धूप और छाया का मिश्रण
यौवन का प्रतिबिंब बन गया
होश समझ बैठा था जिसको, वह रंगीन खुमारी निकली
जो तस्वीर बनाई अपनी, वह तस्वीर तुमहारी निकली

तुमसे भिन्न कहां जग मेरा?
तुम से भिन्न कहां गति मेरी?
तुम से भिन्न स्वयं को समझा,
बहक गई कितनी मति मेरी
मेरी शक्ति तुम्हीं से संचित
मेरी कला तुम्हीं से प्रेरित,
जिसको मैं अपनी जय समझा, वह तो तुमसे हारी निकली
जो तस्वीर बनाई अपनी, वह तस्वीर तुम्हारी निकली

प्रस्तुति- अमोल

शनिवार, 28 फ़रवरी 2009

नज़रिया

इक इमारत लबे-जमनाबही अंदाज़ो-अदा,
मुगलिया दौर की ग़म्माज़ नज़र आती है
जब भी माहताब की हल्की सी किरण पडती है,
ताज के अक्स में मुमताज़ नज़र आती है
//
ताज है इक इमारत मुझे तस्लीम मगर,
बंदा-ए-ज़र तुझे एजाज़ नज़र आती है
मैंने रिसते हुए देखा है गरीबों का लहू,
तुझको हँसती हुई मुमताज़ नज़र आती है
-एम.पी.कौल

गज़ल

कोई दो कदम साथ चलता नहीं है
बस यही ग़म दिल से निकलता नहीं है

इलाही मेरे दिल को शाबाशी दे दे
यह बच्चों के जैसे मचलता नहीं है

कोई तो सितारा मुकद्दर में होगा
यही सोच कर दम निकलता नहीं है

तमाशा-तमाशा; हुए हम तमाशा
मगर फिर भी ये दिल बहलता नहीं है

-सुनीता रैना

दोहे

"न्याय नहीं अन्याय है, मैं कहता हूं साफ
सुख बांटो तो दु:ख मिले, ये कैसा इंसाफ"

"इस दुर्लभ भंडार को, लूट सके तो लूट
जो सच से अच्छे लगें, ऐसे हैं कुछ झूठ"

"खींचातानी हो चुकी, दिशा-दिशा हर ओर
अब मत खींचो सांसों की डोरी है कमज़ोर"

"जैसी बस्ती में रहो, चलन वही अपनाओ
इस बस्ती की रीत है,मारो या मर जाओ"

"जो होना था हो गया,ये किस्मत की बात
इस छोटी सी बात पर,क्या रोना दिन रात"

-डा.अख्तर नज़मी

गुरुवार, 12 फ़रवरी 2009

युग पुरुष

(१) प्रतिशोध

आज शांत है नारी
रंगकर कुन्तल काले
मनुज रक्त से
बांध चुकी है
वेणी अपनी,
वह वेणी जिसकी अलकों ने
लहर-लहर कर
सदा हवा दी
द्वेष अनल को;
वह वेणी जो खुली रही
वनवास काल में
बल खाती काली नागिन सी
नित्य सँजोती रही गरल
कुरु-कुल खाने को!
//
(२) स्म्रति

एकाकी क्षण में
जब भी व्याकुल होता हूं,
वे ही स्म्रति आई हैं
साथ निभाने; साहस देने
शक्ति बढाने; ध्रैय धराने
व्याकुलता की इस बेला में
महानाश में व्यग्र ह्र्दय का
स्पन्दन बन,
महाचिता के विकट ताप में
शीतलता बन;
स्म्रतियाँ जो युगों बाद भी
चिर नवीन हैं!
//
(३) रण छोड

हुआ प्रबल आक्रमण
समय पर जरसंध का;
अगर चाहता तो कर देता
दिव्यायुध से नाश शत्रु का
एक निमिष में!
किन्तु उचित था नहीं आज यह;
साथ खडा था मगध राज के
वह समाज भी;
जो अभिन्न हिस्सा था
अपनी भारत-भूमि का;
यह विचार कर
उद्यत था मैं,
समर-भूमि को त्याग
निकल जाने को रण से;
पर दाऊ थे चाह रहे
दुश्मन से लडना
संगर के निर्णायक क्षण तक
कहने लगे-
कलंक लगेगा समर भूमि से
हट जाने में,
लोक कहेगा कायर थे
बलराम-श्याम जो
जरासन्ध के भय से भागे,
तब अग्रज से किया निवेदन-
"तात! अगर तज आज समर
हुम निकल चलेंगे,
तो न नष्ट होगी
भारत की यह प्रभुसत्ता;
खडी हुई है जो विरोध में
आज हमारे,
जरसन्ध के भय के कारण
अनुचित होगा अपने यश के लिये मिटाना,
समर शक्ति सारे भारत की
लोक कहे कायर मुझको
यह स्वीकार है,
पर ना चाह्ता ह्त्या करना
मात्रभूमि के इन वीरों की;
जिन्हे बाँध भय की डोरी से
खडा किया है मगध राज ने
बलि पशुओं सा
समर यग्य में.
मैं जग में 'रण-छोड' कहाता
चला सुरक्षित पर्वत तजकर;
मुझको अपयश मिला,
किन्तु बच गई शक्तियाँ
अखिल देश की;
महत लक्षय पाने को मैंने
बलि दे दी अपने शुभ यश की
अनिवार्य थी जो विप्ति की
विकट घडी में,
राष्ट्र हित में;
देश बडा है मेरे
यश-अपयश से बढकर!

-डा.क्रष्णगोपाल मिश्र

शुक्रवार, 2 जनवरी 2009

हो रहे हो तुम विदा तो यूं लगा जैसे
फूल से खुशबू विदाई ले रही है
हैं बहुत खामोश बुलबुल के तराने
अनमनी सी चाह की सब तितलियाँ है
जल ह्र्दय के ताल का ठहरा हुआ है
सुप्त भावों की हज़ारों मछलियाँ हैं
और हर इक याद बनकर नववधू अब
आंसुओं की मुँह दिखाई ले रही है
//२//
जो मिला उसको बिछडना ही पडा है
प्रीति के घर की रही ये ही प्रथाएँ
आ गई मन की व्यथाएँ शब्द बनकर
बन गई गीत बिछुडन की कथाएँ
गीत लिख्नने के लिये मन की कलम अब
आंसुओं की रोशनाई ले रही है!
दूर कोई जा रहा है
सागरों से प्यास लेकर
राम का वनवास लेकर
स्वयं को तडपा रहा है
दूर कोई जा रहा है
सोचता हूं इस ह्र्दय की धडकनों में प्रीत क्यूं है?
है विमुख जो आज तक बस वही मनमीत क्यूं है?
याद जो आता रहा आओ चलो पूछें उसी से
प्रीत के इस पंथ पर भी भूलने की रीत क्यूं है
फिर मिलन की आस लेकर;
स्वप्न का विन्यास लेकर
कौन मन समझा रहा है
दूर कोई जा रहा है