बुधवार, 15 अक्तूबर 2008

धरा पर लौट आएंगे....

सफलता के गगन छूकर धरा पर लौट आएंगे
थकन से चूर पंछी शाम को घर लौट आएंगे

बस इतनी आस लेकर जा रहे हैं द्वार पर उनके
उन्हे अपलक निहरेंगे घडी भर, लौट आएंगे

जहां विश्वास और संदेह की मिलती हैं सीमाएं
वहीं पर हम तुम्हारा नाम लिख कर लौट आएंगे

धरा की वस्तु को आकाश कब स्वीकार करता है
पिए हैं सूर्य ने जितने सरोवर, लौट आएंगे

जिन्हे ले जा रहा है स्वर्ण मृग का लोभ जंगल में
तनिक सी दूर जाकर वे धनुरर्ध लौट आएंगे

इसी विश्वास पे सोई नहीं है आज तक राधा
कि मथुरा से किसी दिन श्याम सुंदर लौट आएंगे

-गोविंद आर्य 'निशात'

5 टिप्‍पणियां:

शोभा ने कहा…

अच्छा लिखा है. आपका स्वागत है.

परमजीत बाली ने कहा…

बहुत ही सुन्दर रचना लिखी है।बधाई स्वीकारें।

जिन्हे ले जा रहा है स्वर्ण मृग का लोभ जंगल में
तनिक सी दूर जाकर वे धनुरर्ध लौट आएंगे

ऋचा ने कहा…

काश श्‍याम लौट आते। अच्‍छी रचना। बधाई।

प्रदीप मानोरिया ने कहा…

बहुत सुंदर प्रबाह से युक्त भावः से पूर्ण गीत आपका चिठ्ठा जगत में स्वागत है . मेरे ब्लॉग पर दस्तक देकर देखें अन्दर कैसे व्यंग और गीत रखे हैं

Amit K. Sagar ने कहा…

सचमुच बहुत खूब.