बुधवार, 15 अक्तूबर 2008

फातिहा

मैं तुम्हारी कब्र पर फातिहा पढने नहीं आया
मुझे मालूम था तुम मर नहीं सकते
तुम्हारी मौत की सच्ची खबर जिसने उडाई थी
वो झूठा था
वो तुम कब थे
कोई सूखा हुआ पत्ता हवा से हिल के टूटा था
मेरी आंखें तुम्हारे मंज़रों मे कैद हैं अब तक
मैं जो भी देखता हूं, सोचता हूं, वो वही है जो
तुम्हारी नेकनामी और बदनामी की दुनिया थी
कहीं कुछ भी नहीं बदला.
तुम्हारे हाथ मेरी अंगुलियों में साँस लेते हैं
मैं लिखने के लिये जब भी कलम कागज़ उठाता हूं
तुम्हें बैठा हुआ अपनी ही कुर्सी पे पाता हूं
बदन में मेरे जितना भी लहू है, वो
तुम्हारी लग्जिशों;नाकामियों के साथ बहता है
मेरी आवाज़ में छिप कर तुम्हारा ज़ेहन रहता है
मेरी बीमारियों में तुम
मेरी लाचारियों में तुम
तुम्हारी कब्र पर जिसने तुम्हारा नाम लिखा है
वो झूठा है
तुम्हारी कब्र में मैं दफ्न हूं
तुम मुझमें ज़िंदा हो
कभी फुर्सत मिले तो फातिहा पढने चले आना.
-निदा फाज़ली

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