मंगलवार, 21 अक्तूबर 2008

जाग तुझे है दूर जाना...

चिर सजग आंखें उनींदी;
आज कैसा व्यस्त बाना
जाग तुझे है दूर जाना!

अचल हिमगिरी के हर्द्य में आज चाहे कंप हो ले
या पृलय के अश्रऊओं में मौन अलसित व्योम रो ले
आज पी आलोक को डोले तिमिर की घोर छाया
जागकर विद्युत शिखाओं में निठुर तूफान बोले
जाग तुझे है दूर जाना...

बांध लेंगे क्या तुझे ये मोम के बंधन सजीले?
पंथ की बाधा बनेगें तितलियों के पर रंगीले?
विश्व का कृंदन भुला देगी मधुप की मधुर गुनगुन?
क्या डुबो देंगे तुझे ये फूल के दल ओस गीले?
तू न अपनी छांव को अपने लिये कारा बनाना
जाग तुझे है दूर जाना...!

-महादेवी वर्मा

बुधवार, 15 अक्तूबर 2008

धरा पर लौट आएंगे....

सफलता के गगन छूकर धरा पर लौट आएंगे
थकन से चूर पंछी शाम को घर लौट आएंगे

बस इतनी आस लेकर जा रहे हैं द्वार पर उनके
उन्हे अपलक निहरेंगे घडी भर, लौट आएंगे

जहां विश्वास और संदेह की मिलती हैं सीमाएं
वहीं पर हम तुम्हारा नाम लिख कर लौट आएंगे

धरा की वस्तु को आकाश कब स्वीकार करता है
पिए हैं सूर्य ने जितने सरोवर, लौट आएंगे

जिन्हे ले जा रहा है स्वर्ण मृग का लोभ जंगल में
तनिक सी दूर जाकर वे धनुरर्ध लौट आएंगे

इसी विश्वास पे सोई नहीं है आज तक राधा
कि मथुरा से किसी दिन श्याम सुंदर लौट आएंगे

-गोविंद आर्य 'निशात'

फातिहा

मैं तुम्हारी कब्र पर फातिहा पढने नहीं आया
मुझे मालूम था तुम मर नहीं सकते
तुम्हारी मौत की सच्ची खबर जिसने उडाई थी
वो झूठा था
वो तुम कब थे
कोई सूखा हुआ पत्ता हवा से हिल के टूटा था
मेरी आंखें तुम्हारे मंज़रों मे कैद हैं अब तक
मैं जो भी देखता हूं, सोचता हूं, वो वही है जो
तुम्हारी नेकनामी और बदनामी की दुनिया थी
कहीं कुछ भी नहीं बदला.
तुम्हारे हाथ मेरी अंगुलियों में साँस लेते हैं
मैं लिखने के लिये जब भी कलम कागज़ उठाता हूं
तुम्हें बैठा हुआ अपनी ही कुर्सी पे पाता हूं
बदन में मेरे जितना भी लहू है, वो
तुम्हारी लग्जिशों;नाकामियों के साथ बहता है
मेरी आवाज़ में छिप कर तुम्हारा ज़ेहन रहता है
मेरी बीमारियों में तुम
मेरी लाचारियों में तुम
तुम्हारी कब्र पर जिसने तुम्हारा नाम लिखा है
वो झूठा है
तुम्हारी कब्र में मैं दफ्न हूं
तुम मुझमें ज़िंदा हो
कभी फुर्सत मिले तो फातिहा पढने चले आना.
-निदा फाज़ली